श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजा: ।
सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्‍धृदयं तत: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; प्रवृत्तस्य—संलग्न रहने वाले का; सदा—सदैव; भूतानाम्—जीवों का; श्रेयसि—कल्याण में; द्विजा:—हे द्विजो; सर्वात्मकेन अपि—सभी प्रकार से; यदा—जब; न—नहीं; अतुष्यत्—तुष्ट हो गया; हृदयम्—मन; तत:—उस समय ।.
 
अनुवाद
 
 हे द्विज ब्राह्मणो, यद्यपि वे समस्त लोगों के समग्र कल्याण कार्य में लगे रहे, तो भी उनका मन भरा नहीं।
 
तात्पर्य
 श्री व्यासदेव अपने आप से सन्तुष्ट नहीं थे, यद्यपि उन्होंने जनसामान्य के चतुर्दिक् कल्याण के लिए वैदिक साहित्य तैयार किया था। ऐसी आशा थी कि वे ऐसे कार्यों से संतुष्ट होंगे, लेकिन अन्तत: वे संतुष्ट नहीं हुए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥