श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक
धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नय: ।
मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २८ ॥
भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च प्रदर्शित: ।
द‍ृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
धृत-व्रतेन—कठिन व्रत करते हुए; हि—निश्चय ही; मया—मेरे द्वारा; छन्दांसि—वैदिक मन्त्र; गुरव:—गुरुजन; अग्नय:—यज्ञ की अग्नि; मानिता:—भलीभाँति पूजित; निर्व्यलीकेन—किसी छद्म से रहित; गृहीतम् च—तथा स्वीकृत; अनुशासनम्—पारम्परिक अनुशासन; भारत—महाभारत के; व्यपदेशेन—संकलन से; हि—निश्चय ही; आम्नाय- अर्थ:—शिष्य-परम्परा की अभिव्यक्ति; च—तथा; प्रदर्शित:—ठीक प्रकार से कहा गया; दृश्यते—जो आवश्यक है, उस से; यत्र—जहाँ; धर्म-आदि:—धर्म का मार्ग; स्त्री-शूद्र-आदिभि: अपि—यहाँ तक कि स्त्रियों, शूद्रों आदि के द्वारा.; उत—कहा गया ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने कठिन व्रतों का पालन करते हुए वेदों की, गुरु की तथा यज्ञ वेदी की मिथ्याडम्बर के बिना पूजा की है। मैंने अनुशासन का भी पालन किया है और महाभारत की व्याख्या के माध्यम से शिष्य-परम्परा को अभिव्यक्ति दी है, जिससे स्त्रियाँ, शूद्र तथा अन्य (द्विजबन्धु) लोग भी धर्म के मार्ग का अवलोकन कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 कठोर अनुशासनिक व्रत तथा शिष्य-परम्परा का पालन किए बिना, कोई भी वेदों के अर्थ को नहीं समझ सकता। अभिलाषी व्यक्ति को चाहिए कि वेदों, गुरुओं तथा याज्ञिक अग्नि की पूजा करे। वैदिक ज्ञान की इन समस्त बारीकियों को, क्रमबद्ध रूप में महाभारत में प्रस्तुत किया गया है ताकि स्त्री वर्ग, श्रमिक वर्ग तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कुलों के अयोग्य व्यक्ति उन्हें समझ सकें। इस युग में मूल वेदों की अपेक्षा महाभारत अधिक आवश्यक है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥