श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना ।
कुत: सञ्चोदित: कृष्ण: कृतवान् संहितां मुनि: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
कस्मिन्—किस; युगे—युग में; प्रवृत्ता—प्रारम्भ हुआ; इयम्—इस; स्थाने—स्थान पर; वा—अथवा; केन—किस; हेतुना—कारण से; कुत:—कहाँ से; सञ्चोदित:—प्रेरणा पाई; कृष्ण:—द्वैपायन व्यास ने; कृतवान्—संकलित किया; संहिताम्—वैदिक साहित्य को; मुनि:—विद्वान ।.
 
अनुवाद
 
 यह (कथा) सर्वप्रथम किस युग में तथा किस स्थान में प्रारम्भ हुई और किस कारण इसे प्रारम्भ किया गया? महामुनि कृष्ण द्वैपायन व्यास ने इस साहित्य (ग्रंथ) को संकलित करने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त की?
 
तात्पर्य
 चूँकि श्रीमद्भागवत श्रील व्यासदेव की विशिष्ट कृति है, अतएव विद्वान शौनक मुनि अनेक प्रकार के प्रश्न कर रहे हैं। उन्हें ज्ञात था कि श्रील व्यासदेव अल्पज्ञ स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज परिवारों के पतित जनों को समझाने के लिए वेदों से लेकर महाभारत तक की पहले ही व्याख्या कर चुके हैं। श्रीमद्भागवत उन सबों से दिव्य है, क्योंकि इसमें कुछ भी संसारी नहीं है। अतएव पूछे गये प्रश्न अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण एवं प्रासंगिक हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥