श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 30

 
श्लोक
तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभु: ।
असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्य सत्तम: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तथापि—यद्यपि; बत—दोष; मे—मेरा; दैह्य:—शरीर में स्थित; हि—निश्चय ही; आत्मा—जीव; च—तथा; एव—भी; आत्मना—अपने से; विभु:—पर्याप्त; असम्पन्न:—विहीन; इव आभाति—प्रतीत होता है; ब्रह्म-वर्चस्य—वेदान्तियों का; सत्तम:—परम ।.
 
अनुवाद
 
 वेदों के लिए जितनी बातों की आवश्यकता है, यद्यपि मैं उनसे पूर्णरूप से सज्जित हूँ, तथापि मैं अपूर्णता का अनुभव कर रहा हूँ।
 
तात्पर्य
 निस्सन्देह, श्रील व्यासदेव वैदिक उपलब्धियों से परिपूर्ण थे। पदार्थ (जड़ता) में डूबे हुए जीव की शुद्धि वेद-वर्णित कृत्यों से ही सम्भव है, लेकिन चरम उपलब्धि तो भिन्न है। इसे प्राप्त
किये बिना, जीव चाहे पूर्णरूप से सज्जित क्यों न हो, दिव्य स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसा लगता है कि श्रील व्यासदेव ने संकेत खो दिया था, जिसके कारण वे असन्तुष्ट थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥