श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिता: ।
प्रिया: परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रिया: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
किम् वा—अथवा; भागवता: धर्मा:—जीवों के भक्ति-कार्य; न—नहीं; प्रायेण—प्राय:; निरूपिता:—संकेत किया; प्रिया:—प्रिय; परमहंसानाम्—सिद्ध पुरुषों का; ते एव—वे भी; हि—निश्चय ही; अच्युत—अचूक; प्रिया:—आकर्षक ।.
 
अनुवाद
 
 हो सकता है कि मैंने भगवान् की भक्ति का विशेष रूप से कोई संकेत न किया हो, जो सिद्ध जीवों तथा अच्युत भगवान् दोनों को प्रिय है।
 
तात्पर्य
 श्रील व्यासदेव जिस असंतोष का अनुभव कर रहे थे, वह यहाँ पर उन्हीं के शब्दों में व्यक्त हुआ है। यह असन्तोष भगवान् की भक्ति में जीव की सामान्य दशा में अनुभव किया गया था। जब तक कोई सेवा की सामान्य दशा में स्थित नहीं होता, तब तक न तो भगवान् और न ही जीव पूरी तरह संतुष्ट हो सकते हैं। उन्हें इस दोष का अनुभव तब हुआ, जब उनके गुरु नारद मुनि उनके पास आये। इसका वर्णन इस प्रकार हुआ है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥