श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यत: ।
कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; एवम्—इस प्रकार; खिलम्—अपरा; आत्मानम्—आत्मा; मन्यमानस्य—मन के भीतर सोचते हुए; खिद्यत:—पश्चात्ताप करते; कृष्णस्य—कृष्ण द्वैपायन व्यास का; नारद: अभ्यागात्—नारद का आगमन हुआ; आश्रमम्—कुटिया में; प्राक्—पहले; उदाहृतम्—कहा गया ।.
 
अनुवाद
 
 जैसा कि पहले कहा जा चुका है, जब व्यासदेव अपने दोषों के विषय में पश्चात्ताप कर रहे थे, उसी समय सरस्वती नदी के तट पर स्थित कृष्णद्वैपायन व्यास की कुटिया में नारद जी पधारे।
 
तात्पर्य
 व्यासदेव जिस रिक्तता का अनुभव कर रहे थे, वह उनके ज्ञान के अभाव के कारण न थी। भागवत-धर्म विशुद्ध भगवद् भक्ति है, जहाँ तक अद्वैतवादी की पहुँच नहीं होती। अद्वैतवादी की गणना परमहंसों में नहीं की जाती, जो संन्यास आश्रम में सर्वोच्च होते हैं। श्रीमद्भागवत भगवान् की दिव्य लीलाओं की कथाओं से पूर्ण है। यद्यपि व्यासदेव शक्त्यावेश दिव्य पुरुष थे, तो भी वे असन्तुष्ट थे, क्योंकि उनके किसी भी ग्रंथ में भगवान् की दिव्य लीलाओं का ठीक से वर्णन नहीं था। इसकी प्रेरणा श्रीकृष्ण ने सीधे व्यासदेव के हृदय में उत्पन्न की, अतएव उन्हें रिक्तता का अनुभव हुआ जैसाकि ऊपर कहा गया है। यहाँ यह निश्चित रूप से बताया गया है कि भगवान् की प्रेमाभक्ति के बिना सब कुछ शून्य है, लेकिन भगवान् की भक्तिमय सेवा में सकाम कर्म या शुष्क चिन्तन का अलग से प्रयास किए बिना ही सब कुछ सम्भव है।
 
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