श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनि: ।
पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तम् अभिज्ञाय—उनके (नारद के) शुभ आगमन को देखकर; सहसा—एकाएक; प्रत्युत्थाय—उठकर; आगतम्—आये हुए; मुनि:—व्यासदेव ने; पूजयाम् आस—पूजा; विधि-वत्—विधि (ब्रह्मा) को प्रदान किये जाने वाले सम्मान के साथ; नारदम्—नारद को; सुर-पूजितम्—देवताओं द्वारा पूजित ।.
 
अनुवाद
 
 श्री नारद के शुभागमन पर श्री व्यासदेव सम्मानपूर्वक उठकर खड़े हो गये और उन्होंने सृष्टा ब्रह्मा जी के समान उनकी पूजा की।
 
तात्पर्य
 विधि का अर्थ है प्रथम सृजित जीव ब्रह्मा। वे वेदों के मूल जिज्ञासु तथा आचार्य भी हैं। उन्होंने सर्वप्रथम श्रीकृष्ण से वेदों को सीखा और सबसे पहले नारद जी को पढ़ाया। अतएव आध्यात्मिक शिष्य-परम्परा में नारद जी द्वितीय आचार्य हैं। वे ब्रह्मा के प्रतिनिधि हैं, अतएव उनका सम्मान समस्त विधियों (नियमों) के पिता ब्रह्मा के समान किया जाता है। इसी प्रकार शृंखला के अन्य क्रमागत शिष्यों का भी सम्मान आदि गुरु के प्रतिनिधियों के समान ही किया जाता है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के अन्तर्गत ‘श्री नारद का प्राकट्य’ नामक चतुर्थ अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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