श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
तस्य पुत्रो महायोगी समद‍ृङ्‍‌निर्विकल्पक: ।
एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; पुत्र:—पुत्र; महा-योगी—परम भक्त; सम-दृक्—समदर्शी; निर्विकल्पक:—नितान्त ब्रह्मवादी; एकान्त- मति:—मन की निष्ठा, ब्रह्मवाद में स्थिर; उन्निद्र:—अज्ञान से परे; गूढ:—प्रच्छन्न; मूढ:—जड़; इव—सदृश; इयते—प्रतीत होता है ।.
 
अनुवाद
 
 उनका (व्यासदेव का) पुत्र परम भक्त, समदर्शी ब्रह्मवादी था जिसका मन सदैव ब्रह्मवाद में केन्द्रित रहता था। वह संसारी कर्मों से परे था, लेकिन प्रकट न होने के कारण अज्ञानी-जैसा लगता था।
 
तात्पर्य
 श्रील शुकदेव गोस्वामी मुक्त जीव थे, अतएव वे सदैव जागरूक बने रहे कि वे माया पाश में न फँस जाँय। भगवद्गीता में इस जागरूकता की रोचक व्याख्या की गई है। मुक्त जीव तथा बद्धजीव के पृथक्-पृथक् कार्य हैं। मुक्त जीव निरन्तर आध्यात्मिक उपलब्धि के पथ पर अग्रसर होता रहता है, जो बद्धजीव के लिए एक स्वप्न-जैसा है। बद्धजीव मुक्त जीव के वास्तविक कार्यों की कल्पना तक नहीं कर सकता। जबकि बद्धजीव इन आध्यात्मिक कार्यों का स्वप्न देखता है, किन्तु मुक्त जीव जागृत रहता है। इसी प्रकार बद्धजीव के कार्य मुक्त जीव को स्वप्नवत् प्रतीत होते हैं। भले ही ऊपरी तौर पर बद्धजीव तथा मुक्त जीव एक ही घरातल पर लगे, लेकिन वास्तव में वे भिन्न-भिन्न कार्यों में लगे होते हैं और उनका ध्यान सदैव या तो इन्द्रिय-भोग पर या फिर आत्म-साक्षात्कार की ओर लगा रहता है। बद्धजीव पदार्थ में मग्न रहता है, जबकि मुक्त जीव पदार्थ से पूर्ण रूप से निरपेक्ष रहता है। इस निरपेक्षता की व्याख्या आगे की गई है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥