श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
द‍ृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं
देव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् ।
तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति
स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तद‍ृष्टे: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देखकर; अनुयान्तम्—पीछा करते हुए; ऋषिम्—ऋषि; आत्मजम्—अपने पुत्र को; अपि—यद्यपि; अनग्नम्— नग्न नहीं; देव्य:—सुन्दरियों ने; ह्रिया—लज्जा से; परिदधु:—शरीर ढक लिया; न—नहीं; सुतस्य—पुत्र का; चित्रम्— आश्चर्यजनक; तत् वीक्ष्य—यह देखकर; पृच्छति—पूछता है; मुनौ—मुनि (व्यास) को; जगदु:—उत्तर दिया; तव— तुम्हारा; अस्ति—है; स्त्री-पुम्—नर तथा नारी; भिदा—अन्तर; न—नहीं; तु—लेकिन; सुतस्य—पुत्र का; विविक्त— शुद्ध, पवित्र; दृष्टे:—देखने वाले का ।.
 
अनुवाद
 
 जब श्रील व्यासदेव अपने पुत्र के पीछे-पीछे जा रहे थे, तो नग्न स्नान करती सुन्दर तरुणियों ने वस्त्रों से अपने शरीर ढक लिए, यद्यपि व्यासदेव स्वयं नग्न न थे। लेकिन जब उनका पुत्र वहीं से गुजरा था, तब उन्होंने वैसा नहीं किया था। मुनि ने इसके बारे में पूछा तो तरुणियों ने उत्तर दिया कि उनका पुत्र पवित्र है और जब वह उनकी ओर देख रहा था, तो उसने स्त्री तथा पुरुष में कोई भेद नहीं माना। लेकिन मुनि तो भेद मान रहे थे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (५.१८) में कहा गया है कि विद्वान साधु, अपनी आध्यात्मिक दृष्टि के कारण, किसी विद्वान भद्र ब्राह्मण, चण्डाल, कुत्ता या गाय पर समान दृष्टि रखने वाला होता है। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने वह अवस्था प्राप्त कर ली थी। अतएव उन्होंने स्त्री या पुरुष में भेद नहीं देखा, उन्होंने तो समस्त जीवों को एक भिन्न वेश में देखा। स्नान करती स्त्रियाँ, पुरुष के मन को उसकी चेष्टाओं से जान गईं, जिस प्रकार शिशु को देखकर कोई भी यह जान लेता है कि वह कितना निर्दोष है। शुकदेव गोस्वामी सोलह वर्ष के तरुण थे, अतएव उनके शरीर के सभी अंगों का विकास हो चुका था। वे नग्न भी थे और उन्हीं की तरह स्त्रियाँ भी थीं। लेकिन चूँकि शुकदेव गोस्वामी काम-व्यापार से परे थे, अतएव वे निर्दोष प्रतीत हो रहे थे। स्त्रियाँ अपने विशिष्ट गुणों से इसे तुरन्त जान गईं, अतएव उन्होंने शुकदेव जी के आने की खास परवाह नहीं की। लेकिन जब उनके पिता उधर से गुजरे, तो स्त्रियों ने तुरन्त वस्त्र ओढ़ लिए। ये स्त्रियाँ उनकी पुत्रियों या पौत्रियों जैसी ही थीं; फिर भी व्यासदेव के आने पर उनमें सामाजिक रिवाज के अनुसार प्रतिक्रिया हुई, क्योंकि व्यासदेव गृहस्थ की भूमिका निभा रहे थे। गृहस्थ को स्त्री तथा पुरुष में भेद बरतना होता है; अन्यथा वह गृहस्थ नहीं हो सकता। अतएव मनुष्य को चाहिए कि स्त्री तथा पुरुष के प्रति आसक्ति से रहित होकर शरीर और आत्मा का अन्तर जाने। जब तक उसके मन में ऐसा अन्तर रहे, तब तक उसे शुकदेव गोस्वामी जैसा संन्यासी बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। कम से कम सैद्धान्तिक रूप से मनुष्य को समझ लेना चाहिए कि जीव न तो नर है न नारी। बाहरी बाने को प्रकृति ने पदार्थ से इसलिए तैयार किया है कि उसमें विपरीत लिंग के लिए आकर्षण उत्पन्न हो, जिससे वह इस भौतिक जगत में फँसा रहे। मुक्त जीव इस विकृत भेद से ऊपर होता है। वह दो जीवों में अन्तर नहीं मानता। उसके लिए सभी एक ही आत्मा हैं। इस आध्यात्मिक दृष्टि की पूर्णता मुक्त अवस्था में है और श्रील शुकदेव गोस्वामी ने वह अवस्था प्राप्त कर ली थी। श्रील व्यासदेव भी दिव्य अवस्था में थे, किन्तु गृहस्थ होने के कारण प्रथावश, वे अपने को मुक्त जीव नहीं मानते थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥