श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह ।
संवाद: समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुति: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
कथम्—किस तरह; वा—भी; पाण्डवेयस्य—पाण्डु के वंशज (परीक्षित) के; राजर्षे:—राजर्षि; मुनिना—मुनिके; सह—साथ; संवाद:—संवाद, वार्ता; समभूत्—हुआ; तात—हे प्रिय; यत्र—जहाँ; एषा—इस तरह; सात्वती—दिव्य; श्रुति:—वेदों का सार ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित की इस महामुनि से कैसे भेंट हुई जिसके फलस्वरूप वेदों के इस महान् दिव्य सार (भागवत) का वाचन सम्भव हो सका?
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत को यहाँ पर वेदों का सार कहा गया है। यह काल्पनिक कहानी नहीं है जैसाकि गैर जिम्मेदार लोग प्राय: कहते रहते हैं। इसे शुक-संहिता अर्थात् परम मुक्त मुनि, शुकदेव गोस्वामी द्वारा कहा गया वैदिक स्तोत्र भी कहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥