श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं
न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।
कुत: पुन: शश्वदभद्रमीश्वरे
न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
नैष्कर्म्यम्—आत्म-साक्षात्कार (सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर); अपि—के बावजूद; अच्युत—अमोघ भगवान्; भाव—विचार; वर्जितम्—विहीन, से रहित; न—नहीं; शोभते—अच्छा लगता है; ज्ञानम्—दिव्य ज्ञान; अलम्—धीरे धीरे; निरञ्जनम्—उपाधियों से रहित; कुत:—कहाँ है; पुन:—फिर; शश्वत्—निरन्तर; अभद्रम्—अहितकर, अशुभ; ईश्वरे—ईश्वर के प्रति; न—नहीं; च—तथा; अर्पितम्—अर्पित किया हुआ; कर्म—कर्म; यत् अपि—जो है; अकारणम्— निष्काम ।.
 
अनुवाद
 
 आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान समस्त भौतिक आसक्ति से रहित होने पर भी शोभा नहीं देता यदि वह अच्युत (ईश्वर) के भाव से शून्य हो। तो फिर उन सकाम कर्मों से क्या लाभ है, यदि वे भगवान् की भक्ति के लिए काम न आ सकें और जो स्वभावत: प्रारम्भ से ही दुखप्रद तथा क्षणिक होते है?
 
तात्पर्य
 जैसाकि ऊपर कहा गया है, न केवल भगवान् की दिव्य महिमा से विहीन सामान्य साहित्य भर्त्सना के योग्य है, अपितु भक्तिमय सेवा से विहीन निराकार ब्रह्म विषयक वैदिक साहित्य तथा चिन्तन भी भर्त्सना के योग्य है। यदि उपर्युक्त आधार पर निराकार ब्रह्म के चिन्तन की भर्त्सना की जा सकती है, तो उस सामान्य सकाम कर्म के विषय में क्या कहा जाय, जो भक्ति के उद्देश्य की पूर्ति करने वाला है ही नहीं? ऐसे तार्किक ज्ञान तथा सकाम कर्म से किसी को सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती।
सकाम कर्म, जिसमें लगभग सारे लोग लगे रहते हैं, या तो प्रारम्भ में ही या फिर अन्त में सदैव कष्टकारक होता है। यह तभी लाभप्रद हो सकता है, जब इसे भगवद्भक्ति के अधीन किया जाए। भगवद्गीता में भी इसकी पुष्टि की गई है कि ऐसे सकाम कर्म के फल को भगवान् की सेवा में अर्पित कर देना चाहिए, अन्यथा वह भौतिक बन्धन का कारण होता है। सकाम कर्म के प्रामाणिक भोक्ता भगवान् हैं और जब इसे जीव की इन्द्रियतृप्ति में लगाया जाता है, तो यह घोर कष्ट का कारण बन जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥