श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासत:
स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रम: ।
यद्वाक्यतो धर्म इतीतर: स्थितो
न मन्यते तस्य निवारणं जन: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
जुगुप्सितम्—अत्यन्त घृणित; धर्म-कृते—धर्म हेतु; अनुशासत:—आदेश के अनुसार; स्वभाव-रक्तस्य—स्वभाव से अनुरक्त; महान्—महान; व्यतिक्रम:—अनुचित; यत्-वाक्यत:—जिसके उपदेश से; धर्म:—धर्म; इति—इस प्रकार है; इतर:—जन-सामान्य; स्थित:—स्थिर; न—नहीं; मन्यते—सोचते हैं; तस्य—उसका; निवारणम्—निषेध; जन:—वे लोग ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्य लोगों में भोग करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और तुमने धर्म के नाम पर उन्हें वैसा करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया है। यह अत्यन्त घृणित तथा अत्यन्त अनुचित है। चूँकि वे लोग तुम्हारे उपदेशों के अनुसार मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, अत: वे ऐसे कार्यों को धर्म के नाम पर ग्रहण करेंगे और निषेधों की भी परवाह नहीं करेंगे।
 
तात्पर्य
 श्रील नारद ने यहाँ पर महाभारत तथा अन्य साहित्य में उद्धृत सकाम कर्मों के नियमित अनुष्ठानों के आधार पर, श्रील वेदव्यास द्वारा संकलित विभिन्न वैदिक ग्रंथों की भर्त्सना की है। मानव (प्राणियों) में जन्म-जन्मान्तर से दीर्घकालीन भौतिक संगति के कारण, भौतिक शक्ति पर प्रभुता प्राप्त करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। उन्हें मानव जीवन के उत्तरदायित्व का कोई बोध नहीं हो पाता। यह मानव जीवन मोहमय पदार्थ के चंगुल से छूटने का अवसर होता है। वेद भगवद्धाम वापस जाने के निमित्त हैं। ८४,००,००० योनियों के आवागमन-चक्र में घूमते रहना दण्डित बद्धजीवों के लिए बन्दी जीवन के समान है। मनुष्य योनि इस बन्दी जीवन से बाहर निकलने का सुअवसर होता है, अतएव मनुष्य का एक-मात्र कर्तव्य यह है कि वह भगवान् के साथ अपने भूले हुए सम्बन्ध को पुन: स्थापित करे। ऐसी परिस्थितियों में, धार्मिक कृत्यों की आड़ में इन्द्रिय भोग की योजना बनाने को प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। मानवशक्ति के ऐसे विक्षेप से पथभ्रष्ट सभ्यता का जन्म होता है। श्रील व्यासदेव महाभारत इत्यादि में वैदिक व्याख्या के प्रमाण स्वरूप हैं, अत: उनके द्वारा किसी भी रूप में इन्द्रिय भोग को प्रोत्साहन देना आध्यात्मिक विकास में भारी अवरोध है, क्योंकि लोग उन भौतिक कार्यों को त्यागना नहीं चाहेंगे, जो उन्हें भव-बन्धन में जकड़े हुए हैं। मानव सभ्यता की किसी विशेष अवस्था में जब धर्म के नाम पर ऐसे भौतिक कार्यों का (यथा यज्ञ के नाम पर पशु-बलि का) बोलबाला हुआ, तो स्वयं भगवान् बुद्ध के रूप में अवतरित हुए और धर्म के नाम पर पशु-वध बन्द करने के उद्देश्य से वेद-प्रमाण की निन्दा की। नारद को इसका पूर्वाभास हो गया था, अतएव उन्होंने ऐसे साहित्य की निन्दा की। आज भी मांस-भक्षी लोग धर्म के नाम पर किसी देवता या देवी के समक्ष पशु-बलि चढ़ाते हैं, क्योंकि किन्हीं-किन्हीं वैदिक ग्रंथों में ऐसे नियमित यज्ञों की संस्तुति की जाती है। उन्हें मांसाहार से विरत होने के उद्देश्य से ही इस प्रकार की संस्तुति की जाती है, लेकिन धीरे-धीरे ऐसे धार्मिक कृत्यों के उद्देश्य भुला दिये जाते हैं और कसाई घर प्रधान बन जाते हैं। इसका कारण यह है कि ऐसे मूर्ख भौतिकतावादी व्यक्ति उन लोगों की बातें नहीं सुनना चाहते, जो वैदिक अनुष्ठानों की व्याख्या करने में समर्थ हैं।

वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि जीवन की सफलता न तो किसी बृहद् ग्रंथ के लिखने, न धन संचय करने और न ही सन्तति बढ़ाने में है। इसे अनासक्ति द्वारा ही प्राप्त किया जाता है। लेकिन भौतिकतावादी व्यक्ति ऐसे आदेशों को अनसुना करते हैं। उनके अनुसार तथाकथित संन्यास आश्रम उन व्यक्तियों के लिए है, जो किसी शारीरिक दोष के कारण जीविका कमाने में अक्षम हैं या उन व्यक्तियों के लिए है, जिन्हें पारिवारिक सम्पन्नता नहीं मिल पाई।

निस्सन्देह, महाभारत जैसे इतिहास-ग्रंथों में आध्यात्मिक विषयों के साथ-साथ लौकिक विषयों की भी चर्चा है। महाभारत में ही भगवद्गीता सन्निविष्ट है। महाभारत की सम्पूर्ण विचारधारा की अन्तिम परिणति भगवद्गीता के इस चरम उपदेश के रूप में होती है कि मनुष्य को चाहिए कि सारी व्यस्तताएँ त्याग कर, भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों की शरण में जाकर, अपने को पूरी तरह लगा दे। लेकिन भौतिकतावादी प्रवृत्तियों वाले लोग राजनीतिक, अर्थशास्त्र

तथा परोपकारी कार्यों में अधिक रुचि रखते हैं,जिनका उल्लेख महाभारत में है और मुख्य विषय अर्थात् भगवद्गीता के प्रति कम रुचि दिखाते हैं। श्री नारद व्यासदेव की इस समझौतावादी प्रवृत्ति की प्रत्यक्ष भर्त्सना करते हैं और यह उपदेश देते हैं कि प्रत्यक्ष रूप से यह घोषित करें कि मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकता भगवान् के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को अनुभव करना तथा अविलम्ब भगवान् की शरण में जाना है।

किसी विशेष रोग से पीडि़त मरीज प्राय: उसके लिए वर्जित की गई वस्तुओं को खाने को ललचाता है। लेकिन दक्ष चिकित्सक कभी भी मरीज से समझौता करके उसे कुपथ्य खाने की अनुमति नहीं देता। भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि सकाम कर्म में अनुरक्त व्यक्ति को उसकी वृत्ति से पराङ्मुख नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसे धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार के पद तक ऊपर उठया जा सकता है। कभी-कभी यह उन लोगों पर लागू होता है, जो बिना किसी आध्यात्मिक अनुभूति के कोरे मीमांसक बने रहते हैं। लेकिन जो भक्ति के पथ पर लगे हैं, उन्हें ऐसे उपदेश की हमेशा आवश्यकता नहीं रहती।

 
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