श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भ‍ुतम् ।
कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
जिज्ञासितम्—पूर्ण रूप से पूछा गया; सुसम्पन्नम्—पटु, दक्ष; अपि—होने पर भी; ते—तुम्हारा; महत्-अद्भुतम्—महान तथा अद्भुत; कृतवान्—तैयार किया; भारतम्—महाभारत; य: त्वम्—जो तुमने किया है; सर्व-अर्थ—सम्पूर्ण फलों सहित; परिबृंहितम्—विस्तार से व्याख्या की गई ।.
 
अनुवाद
 
 तुम्हारी जिज्ञासाएँ पूर्ण हैं और तुम्हारा अध्ययन भी भलीभाँति पूरा हो चुका है। इसमें संदेह नहीं कि तुमने एक महान् एवं अद्भुत ग्रंथ महाभारत तैयार किया है, जो सभी प्रकार के वैदिक फलों (पुरुषार्थों) की विशद व्याख्या से युक्त है।
 
तात्पर्य
 व्यासदेव के विषाद का कारण उनमें पर्याप्त ज्ञान का अभाव नहीं था, क्योंकि छात्र के रूप में उन्होंने वैदिक साहित्य का
पूर्ण अवगाहन किया था, जिसके फलस्वरूप उन्होंने महाभारत का संकलन किया जो वेदों की पूर्ण व्याख्या से समन्वित है।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥