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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.5.37 
ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नम: सङ्कर्षणाय च ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
—भगवान् की दिव्य महिमा के कीर्तन का प्रतीक; नम:—भगवान् को नमस्कार करना; भगवते—भगवान् को; तुभ्यम्—तुमको; वासुदेवाय—वसुदेव के पुत्र भगवान् को; धीमहि—उच्चारण या कीर्तन करें; प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय सङ्कर्षणाय—ये तीनों वासुदेव के पूर्ण अंश हैं; नम:—सादर नमस्कार है; —तथा ।.
 
अनुवाद
 
 आइये, हम सब वासुदेव तथा उनके पूर्ण अंश प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण सहित उनकी महिमा का कीर्तन करें।
 
तात्पर्य
 पञ्चरात्र के अनुसार, नारायण ईश्वर के समस्त विस्तारों के आदि कारण हैं। ये विस्तार हैं—वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध। वासुदेव तथा संकर्षण बाएँ-दाएँ आसीन हैं, प्रद्युम्न संकर्षण के दाएँ हैं और अनिरुद्ध वासुदेव की बाईं ओर आसीन हैं। इस प्रकार ये चारों विग्रह आसीन रहते हैं। ये चारों भगवान् श्रीकृष्ण के चतुर्व्यूह के रूप में जाने जाते हैं।

यह एक वैदिक मन्त्र है जो ॐकार प्रणव से प्रारम्भ होता है। इस प्रकार इस मंत्र को ॐ नमो धीमहि... के रूप में दिव्य उच्चारण (कीर्तन) के द्वारा स्थापित किया जाता है। तात्पर्य यह है कि कोई भी आदान-प्रदान, चाहे वह सकाम कर्म के क्षेत्र में हो या ज्ञान के क्षेत्र में हो, जिसका परम लक्ष्य परमेश्वर की दिव्य अनुभूति नहीं होता, व्यर्थ माना जाता है। इसलिए नारद ने अपने अनुभव के आधार पर, अनन्य भक्तिमय सेवा की प्रकृति की व्याख्या की है, जिसमें प्रगतिशील भक्ति-कार्यों की क्रमिक विधि से भगवान् तथा जीव के मध्य अन्तरंग सम्बन्ध विकसित किया जाता है। भगवान् के लिए दिव्य भक्ति की ऐसी प्रगति का अन्त भगवान् की प्रेममयी सेवा में होता है, जिसे प्रेमा कहते हैं और जो अपनी दिव्य विविधताओं में रस कहलाती है। ऐसी भक्ति मिश्रित रूपों में भी सम्पन्न होती है, जैसे कि सकाम कर्म या तर्कवितर्क के साथ मिश्रित होकर।

अब जिस प्रश्न को शौनक आदि ऋषियों ने उठाया था और जिसका सम्बन्ध गुरु के माध्यम से सूत जी की उपलब्धि के गुह्य अंश से था, उसकी व्याख्या इस श्लोक में की गई है और वह है तैंतीस अक्षरों वाले इस मन्त्र का उच्चारण। यह मन्त्र चार विग्रहों को अथवा भगवान् को उनके पूर्णांशों के सहित सम्बोधित है। केन्द्रीय विग्रह तो भगवान् श्रीकृष्ण हैं, क्योंकि ये पूर्ण अंश उनके अंगरक्षक हैं। इस उपदेश का गुह्यतम अंश यह है कि मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के विभिन्न अंशों—वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध समेत पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा का निरन्तर कीर्तन तथा स्मरण करे। ये विस्तार अन्य समस्त रूपों यथा विष्णुतत्त्व या शक्ति तत्त्वों के मूल विग्रह रूप हैं।

 
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