श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 38

 
श्लोक
इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम् ।
यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शन: पुमान् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; मूर्ति—प्रतिरूप; अभिधानेन—शब्द या ध्वनि में; मन्त्र-मूर्तिम्—दिव्य उच्चारण का स्वरूप; अमूर्तिकम्—भगवान् जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है; यजते—पूजा करते हैं; यज्ञ—विष्णु; पुरुषम्—भगवान् को; स:—वह ही; सम्यक्—पूर्णरूप से; दर्शन:—जिसने देखा है; पुमान्—व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार वास्तविक दृष्टा वही है, जो दिव्य मन्त्रमूर्ति, श्रीभगवान् विष्णु की पूजा करता है, जिनका कोई भौतिक रूप नहीं होता।
 
तात्पर्य
 हमारी वर्तमान इन्द्रियाँ भौतिक तत्त्वों की बनी हैं, अतएव वे भगवान् विष्णु के दिव्य रूप की ठीक से अनुभूति नहीं कर पातीं। अत: उनकी पूजा कीर्तन की दिव्य विधि के माध्यम से ध्वनि में की जाती है। जो वस्तु हमारी अपूर्ण इन्द्रियों के क्षेत्र के बाहर है, उसे ध्वनि स्वरूप के द्वारा भली-भाँति अनुभव किया जा सकता है। यदि कोई दूर खड़ा ध्वनि उत्पन्न करे तो उसका यथार्थ अनुभव किया जा सकता है। यदि भौतिक दृष्टि से यह सम्भव है, तो फिर आध्यात्मिक दृष्टि से क्यों नहीं होगा? यह अनुभव कोई कोरा निराकार अनुभव नहीं है। यह उन दिव्य ईश्वर का वास्तविक अनुभव है जो सच्चिदानन्दस्वरूप हैं।
अमरकोश नामक संस्कृत कोश में मूर्ति शब्द के दो आशय प्रमुख हैं—स्वरूप तथा कठिनाई। अतएव आचार्य श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अमूर्तिकम् का अर्थ “किसी कठिनाई के बिना” लगाया है। शाश्वत आनन्द तथा ज्ञान के दिव्य स्वरूप का अनुभव हमारी मूल आध्यात्मिक इन्द्रियों द्वारा ही हो सकता है, जिसे पवित्र मन्त्रों के उच्चारण या दिव्य उच्चारण ध्वनि द्वारा पुनरुज्जीवित किया जा सकता है। ऐसी ध्वनि प्रामाणिक गुरु के पारदर्शी माध्यम द्वारा प्राप्त की जानी चाहिए और गुरु के निर्देशन में ही इसके उच्चारण (कीर्तन) का अभ्यास करना चाहिए। यह हमें धीरे-

धीरे ईश्वर के अधिक निकट ले जाएगा। पूजा की यह विधि पाञ्चरात्रिक विधि में संस्तुत है जो मान्य एवं प्रामाणिक विधि है। पाञ्चरात्रिक विधि में दिव्य भक्तिमय सेवा के लिए सर्वाधिक प्रामाणिक संकेत प्राप्त हैं। ऐसे संकेतों के बिना शुष्क दार्शनिक चिन्तन द्वारा निश्चित ही भगवान् के पास नहीं पहुँचा जा सकता है। पञ्चरात्रिक विधि इस कलह-प्रधान युग के लिए व्यावहारिक एवं उपयुक्त है। इस आधुनिक युग के लिए पञ्चरात्र, वेदान्त की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥