श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
इमं स्वनिगमं ब्रह्मन्नवेत्य मदनुष्ठितम् ।
अदान्मे ज्ञानमैश्वर्यं स्वस्मिन् भावं च केशव: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
इमम्—इस प्रकार; स्व-निगमम्—भगवान् विषयक वेदों का गुह्य ज्ञान; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण (व्यासदेव); अवेत्य—यह जानकर; मत्—मेरे द्वारा; अनुष्ठितम्—सम्पन्न; अदात्—वर दिया; मे—मुझे; ज्ञानम्—दिव्य ज्ञान; ऐश्वर्यम्—ऐश्वर्य; स्वस्मिन्—निजी; भावम्—प्रगाढ़ प्यार तथा स्नेह; च—तथा; केशव:—भगवान् कृष्ण ने ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मण, इस प्रकार सर्वप्रथम भगवान् कृष्ण ने मुझे वेदों के गुह्यतम अंशों में निहित भगवान् के दिव्य ज्ञान का, फिर आध्यात्मिक ऐश्वर्य का और तब अपनी घनिष्ठ प्रेममय सेवा का वर दिया।
 
तात्पर्य
 दिव्य शब्द द्वारा भगवान् के साथ संसर्ग सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण से अभिन्न है। भगवान् तक पहुँचने की यह सबसे पूर्ण विधि है। भगवान् के साथ ऐसे शुद्ध संसर्ग द्वारा, जो भौतिक विचारों के अपराधों से रहित है (जिनकी संख्या दस है), भक्त भौतिक स्तर से ऊपर उठकर वैदिक साहित्य के तात्पर्य को समझता है एवं दिव्य संसार में भगवान् के अस्तित्व को भी समझता है। जो अपने गुरु तथा भगवान् में अनन्य श्रद्धा रखता है, उसे भगवान् क्रमश: अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराते हैं। इसके पश्चात् भक्त को योग की सिद्धियाँ प्रदान की जाती हैं, जिनकी संख्या आठ है। इनसे भी बढक़र, भक्त को भगवान् का पार्षद स्वीकार कर लिया जाता है और उसे गुरु के माध्यम से भगवान् की विशिष्ट सेवा का कार्यभार सौंपा जाता है। शुद्ध भक्त अपनी सुप्त योग-सिद्धियों के प्रदर्शन की अपेक्षा भगवान् की सेवा करने में अधिक रुचि रखता है। श्री नारद ने इन सबका वर्णन अपने निजी अनुभव से किया है और मनुष्य को वे सारी सुविधाएँ प्राप्त हो सकती हैं, जो श्री नारद को भगवान् के शब्द-प्रतिरूप के उच्चारण से प्राप्त हुई थीं। इस दिव्य ध्वनि (शब्दों) के उच्चारण पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, बशर्तें कि इसे नारद के प्रतिनिधि से प्राप्त किया जाय, जो गुरू-शिष्य परम्परा पद्धति से चला आ रहा है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥