श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
चित्रधातुविचित्राद्रीनिभभग्नभुजद्रुमान् ।
जलाशयाञ्छिवजलान्नलिनी: सुरसेविता: ।
चित्रस्वनै: पत्ररथैर्विभ्रमद्भ्रमरश्रिय: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
चित्र-धातु—मूल्यवान खनिज यथा सोना चाँदी तथा ताँबा; विचित्र—विविधतापूर्ण; अद्रीन्—पहाडिय़ाँ; इभ-भग्न— विशालकाय हाथियों द्वारा तोड़ी गई; भुज—शाखाएँ; द्रुमान्—वृक्ष; जलाशयान् शिव—स्वास्थ्यवर्धक; जलान्— जलाशय; नलिनी:—कमल के फूल; सुर-सेविता:—स्वर्ग के निवासियों द्वारा जिसकी कामना की जाय; चित्र-स्वनै:— हृदयग्राही; पत्र-रथै:—पक्षियों द्वारा; विभ्रमत्—मदान्ध; भ्रमर-श्रिय:—भौंरों से अलंकृत ।.
 
अनुवाद
 
 मैं सोने, चाँदी तथा ताँबे जैसे विविध खनिजों के आगारों से परिपूर्ण पर्वतों तथा सुन्दर कमलों से पूर्ण जलाशयों से युक्त भूभागों को पार करता रहा जो स्वर्ग के वासियों के उपयुक्त थे और मदान्ध भौरों तथा चहचहाते पक्षियों से सुशोभित थे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥