श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
नलवेणुशरस्तन्बकुशकीचकगह्वरम् ।
एक एवातियातोऽहमद्राक्षं विपिनं महत् ।
घोरं प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
नल—नरकट; वेणु—बाँस; शर:—सरपत; तन्ब—से परिपूर्ण; कुश—नुकीली घास, कुश; कीचक—अपतृण; गह्वरम्—गुफाएँ; एक:—अकेले; एव—केवल; अतियात:—दुर्गम; अहम्—मैंने; अद्राक्षम्—देखा; विपिनम्—गहन जंगल; महत्—विशाल; घोरम्—भयावना; प्रतिभय-आकारम्—भयानक; व्याल—सर्प; उलूक—उल्लू; शिव—सियार; अजिरम्—मैदान ।.
 
अनुवाद
 
 तब मैं अनेक जंगलों में से होकर अकेला गया जो नरकटों, बाँसों, सरपतों, कुशों, अपतृणों तथा गह्वरों से परिपूर्ण थे और जिनसे अकेले निकल पाना कठिन था। मैंने अत्यन्त सघन, अंधकारपूर्ण तथा अत्यधिक भयावने जंगल देखे जो सर्पों, उल्लुओं तथा सियारों की क्रीड़ास्थली बने हुए थे।
 
तात्पर्य
 किसी भी परिव्राजकाचार्य का यह कर्तव्य होता है कि वह समस्त जंगलों, पर्वतों, नगरों, ग्रामों आदि का विचरण करते हुए भगवान् की सृष्टि की विविधता का अनुभव करे, ईश्वर के प्रति श्रद्धावान बने, मन में दृढ़ता लाए तथा साथ ही साथ लोगों को ईश्वर के सन्देश से प्रबोधित कराए। संन्यासी को भय त्याग कर ये सारे संकट उठाने पड़ते हैं। वर्तमान युग के सबसे विशिष्ट संन्यासी भगवान् चैतन्य हैं, जिन्होंने इसी विधि से मध्य भारत के जंगलों में से होकर यात्रा की और शेरों, भालुओं, सर्पों, हिरनों, हाथियों तथा जंगल के अन्य पशुओं को भी प्रबुद्ध बनाया। इस कलियुग में सामान्य व्यक्ति के लिए संन्यास वर्जित है। जो केवल गेरुवा चोला पहनकर अपना दिखावा करता है, वह मौलिक आदर्श संन्यासी के समान नहीं होता। फिर भी मनुष्य को चाहिए कि सामाजिक सम्बन्धों को तोडऩे का व्रत ले और केवल भगवान् की सेवा में ही जीवन बिताए। वेश बदलना तो एक औपचारिकता मात्र है। भगवान् चैतन्य ने संन्यासी के नाम का स्वीकार नहीं किया था, और इस कलियुग के तथाकथित संन्यासियों को चाहिए कि वे भगवान् चैतन्य का अनुसरण करते हुए अपने मूल नामों को न बदलें। इस युग में भगवान् के पवित्र यश के श्रवण तथा कीर्तन वाली भक्ति की संस्तुति की गई है और जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन छोडक़र संन्यास-व्रत ग्रहण करता है, उसे नारद या चैतन्य जैसे परिव्राजकाचार्यों का अनुकरण न करके, किसी पवित्र स्थान में बैठ कर अपना सारा समय वृन्दावन के षट् गोस्वामी-जैसे आचार्यों द्वारा संकलित पवित्र शास्त्रों के श्रवण एवं कीर्तन में व्यतीत करना चाहिए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥