श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरि: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
ध्यायत:—इस तरह ध्यान करते हुए; चरण-अम्भोजम्—अन्तर्यामी भगवान् के चरणकमलों का; भाव-निर्जित—भगवान् के दिव्य प्रेम में परिणत मन; चेतसा—सारी मानसिक गतिविधियाँ (सोचना, अनुभव करना तथा इच्छा करना); औत्कण्ठ्य—उत्सुकता; अश्रु-कल—आँसू निकल आये; अक्षस्य—आँखो के; हृदि—हृदय में; आसीत्—प्रकट हुए; मे—मेरे; शनै:—तुरन्त; हरि:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 ज्योंही मैं अपने मन को दिव्य प्रेम में लगाकर भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करने लगा कि मेरे नेत्रों से आँसू बहने लगे और भगवान् श्रीकृष्ण बिना विलम्ब किए मेरे हृदय- कमल में प्रकट हो गये।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर भाव शब्द महत्त्वपूर्ण है। यह भाव अवस्था तब प्राप्त होती है, जब भगवान् के लिए दिव्य प्रेम होता है। प्रारम्भिक अवस्था श्रद्धा अथवा भगवान् के प्रति चाह कहलाती है। इस चाह को बढ़ाने के लिए मनुष्य को शुद्ध भक्तों की संगति करना जरूरी है। तीसरी अवस्था में भक्ति के विधि-विधानों का अभ्यास करना होता है। इससे सारी आशंकाएँ दूर हो जाती हैं और भक्ति पथ में अवरोध उत्पन्न करने वाली सारी वैयक्तिक त्रुटियां हट जाती हैं।

जब सारी आशंकाएँ तथा वैयक्तिक त्रुटियां दूर हो जाती हैं, तो दिव्य तत्त्व में आदर्श श्रद्धा होती है और उसके प्रति रुचि अधिक अनुपात में बढ़ती है। इस अवस्था से आकर्षण उत्पन्न होता है और इसके बाद भाव की अवस्था प्राप्त होती है, जो भगवान् के प्रति अटल प्रेम की पूर्व अवस्था है। ये सारी अवस्थाएँ दिव्य प्रेम के विकास की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। इस प्रकार दिव्य प्रेम से अभिभूत होने पर वियोग (विरह) की प्रबल अनुभूति होती है, जिससे आठ प्रकार की विभिन्न ऊर्मियों की उत्पत्ति होती है। भक्त के नेत्रों से अश्रुपात होना इसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया है और चूँकि श्री नारद मुनिने अपने पूर्वजन्म में घर छोडऩे के तुरन्त बाद ही यह अवस्था प्राप्त कर ली थी, अतएव उनके लिए भगवान् की उपस्थिति को देख पाना सरल था, जिसे उन्होंने बिना कोई भौतिक कल्मष वाली अपनी विकसित आध्यात्मिक इन्द्रियों के द्वारा सहज ही अनुभव कर लिया।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥