श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृत: ।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
प्रेमा—प्रेम; अतिभर—अत्यधिक; निर्भिन्न—विशेष रूप से विभेदित; पुलक—प्रसन्नता की अनुभूति; अङ्ग:—शरीर के विभिन्न अंग; अति-निर्वृत:—पूर्ण रूप से अभिभूत होकर; आनन्द—आह्लाद के; सम्प्लवे—समुद्र में; लीन:—मग्न; न— नहीं; अपश्यम्—देख सका; उभयम्—दोनों को; मुने—हे व्यासदेव ।.
 
अनुवाद
 
 हे व्यासदेव, उस समय प्रसन्नता की अनुभूति होने के कारण, मेरे शरीर का अंग-प्रत्यंग पुलकित हो उठा। आनन्द के सागर में निमग्न होने के कारण मैं अपने आपको और भगवान् को भी न देख सका।
 
तात्पर्य
 सुख तथा उत्कट आनन्द की तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों की कोई सांसारिक तुलना नहीं हो सकती। अतएव ऐसी अनुभूतियों को व्यक्त कर पाना अत्यन्त कठिन होता है। ऐसे आनन्द की एक झलक हमें श्री नारद मुनि के शब्दों से मिल सकती है। शरीर अथवा इन्द्रियों के प्रत्येक अंग का अपना एक विशेष कार्य होता है। भगवान् का दर्शन करने पर सारी इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा करने के लिए जागृत हो उठती हैं, क्योंकि मुक्त अवस्था में इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा करने में सक्षम होती हैं। इस प्रकार से दिव्य आनन्द की अवस्था में ऐसा हो गया कि इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा के लिए पृथक् रूप से उत्कण्ठित हो गईं। ऐसा होने से नारद मुनि अपने आपको तथा भगवान् को एकसाथ देखने में खो गये।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥