श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान्मा मां द्रष्टुमिहार्हति ।
अविपक्‍वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
हन्त—हे नारद; अस्मिन्—इस; जन्मनि—जन्म में; भवान्—तुम; मा—नहीं; माम्—मुझको; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इह—यहाँ; अर्हति—योग्य हो; अविपक्व—अप्रौढ़; कषायाणाम्—भौतिक, कल्मष; दुर्दर्श:—देख पाना कठिन; अहम्—मैं; कुयोगिनाम्—सेवा में अपूर्ण ।.
 
अनुवाद
 
 (भगवान् ने कहा) हे नारद, मुझे खेद है कि तुम इस जीवन काल में अब मुझे नहीं देख सकोगे। जिनकी सेवा अपूर्ण है और जो समस्त भौतिक कल्मष से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हैं, वे मुश्किल से ही मुझे देख पाते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् को अत्यन्त शुद्ध, सर्वोपरि तथा परम सत्य के रूप में वर्णित किया गया है। उनके व्यक्तित्व में भौतिकता लेशमात्र भी नहीं रहती, अतएव जिस व्यक्ति में रंचमात्र भी भौतिक अनुराग रहता है, वह उन तक नहीं पहुँच सकता। भक्तिमय सेवा का शुभारम्भ तब होता है, जब मनुष्य कम-से-कम दो भौतिक गुणों से—रजोगुण तथा तमोगुण से—मुक्त हो जाता है। काम तथा लोभ से मुक्त होना ही इसका लक्षण है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को इन्द्रियतुष्टि की इच्छाओं तथा इन्द्रियतृप्ति की तृष्णा से मुक्त हो जाना चाहिए। प्रकृति का संतुलित गुण सत्त्वगुण है और समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त होने के लिए उसे सत्त्वगुण से भी ऊपर उठना होता है। किसी एकान्त वन में जाकर भगवान् के दर्शन (साक्षात्कार) की खोज करना सत्त्वगुण में आता है। मनुष्य आध्यात्मिक सिद्धि के लिए वन में जा सकता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे वहाँ भगवान् का साक्षात् दर्शन हो ही जाय। मनुष्य को समस्त भौतिक आसक्ति से रहित होना चाहिए और अध्यात्म के धरातल पर स्थित होना चाहिए, तभी उसे भगवान् का सान्निध्य प्राप्त हो सकता है। अतएव सर्वोत्तम विधि यह है कि मनुष्य वहाँ जाकर रहे, जहाँ भगवान् के दिव्य रूप की पूजा की जाती है। भगवान् का मन्दिर एक दिव्य स्थान होता है, जब कि वन भौतिक दृष्टि से उत्तम निवास-स्थान है। नवदीक्षित भक्त को भी भगवान् की खोज करने के लिए जंगल जाने के लिये नहीं, अपितु भगवान् के विग्रह की पूजा (अर्चना) करने के लिए कहा जाता है। भगवान् की अर्चना से ही भक्ति का शुभारम्भ होता है और यह वन में जाने की अपेक्षा श्रेष्ठ है। नारद मुनि को अपने वर्तमान जीवन में वन जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे समस्त भौतिक लालसाओं से मुक्त हैं और वे अपनी उपस्थिति से ही प्रत्येक स्थान को वैकुण्ठ में बदल सकते हैं। वे मनुष्यों, देवों, किन्नरों, गंधर्वों, ऋषियों, मुनियों तथा अन्यों को भगवान् का भक्त बनाने के लिए एक लोक से दूसरे लोक में विचरण करते रहते हैं। उन्होंने अपने कार्य-कलापों से ही प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज जैसे अनेक भक्तों को भगवान् की दिव्य सेवा में लगाया है। अतएव भगवान् का शुद्ध भक्त नारद तथा प्रह्लाद जैसे महान भक्तों के पदचिह्नों पर चलता है और कीर्तन की प्रक्रिया के द्वारा भगवान् की महिमा का गुणगान करने में अपना पूरा समय लगाता है। ऐसी उपदेश विधि समस्त भौतिक गुणों से परे है।
 
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