श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
एतावदुक्त्वोपरराम तन्महद्
भूतं नभोलिङ्गमलिङ्गमीश्वरम् ।
अहं च तस्मै महतां महीयसे
शीर्ष्णावनामं विदधेऽनुकम्पित: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
एतावत्—इस प्रकार; उक्त्वा—कह कर; उपरराम—रुक गया; तत्—वह; महत्—महान्; भूतम्—आश्चर्यजनक; नभ: लिङ्गम्—शब्द द्वारा व्यक्त; अलिङ्गम्—नेत्रों से न दिखने वाला, अदृश्य; ईश्वरम्—परम पुरुष को; अहम्—मैं; च—भी; तस्मै—उनको; महताम्—महान्; महीयसे—महिमा मंडित; शीर्ष्णा—शिर से; अवनामम्—नमस्कार; विदधे—किया; अनुकम्पित:—उनके द्वारा कृपा दिखाये जाने पर ।.
 
अनुवाद
 
 तब शब्द से व्यक्त तथा नेत्रों से अदृश्य उन नितान्त आश्चर्यमय परम पुरुष ने बोलना बन्द कर दिया। मैंने कृतज्ञता का अनुभव करते हुए शीश झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।
 
तात्पर्य
 यदि भगवान् केवल सुनाई पड़ें, दिखें नहीं, तो इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। भगवान् ने अपने श्वास से चारों वेद उत्पन्न किये। उन्हें वेदों के दिव्य उच्चारण से ही देखा और अनुभव किया जाता है। इसी प्रकार भगवद्गीता भगवान् की शब्द-अभिव्यक्ति है और इनमें तथा इनके स्वरूप में कोई अन्तर नहीं है। निष्कर्ष यह है कि भगवान् को निरन्तर दिव्य ध्वनि के उच्चारण द्वारा देखा और सुना जा सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥