श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 26

 
श्लोक
नामान्यनन्तस्य हतत्रप: पठन्
गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् ।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृह:
कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सर: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
नामानि—पवित्र नाम, यश आदि.; अनन्तस्य—असीम के; हत-त्रप:—भौतिक जगत की सारी औपचारिकताओं से मुक्त होकर; पठन्—जप से, पाठ से.; गुह्यानि—रहस्यमय; भद्राणि—कल्याणकर; कृतानि—कार्य; च—तथा; स्मरन्— निरन्तर स्मरण करते हुए; गाम्—पृथ्वी पर; पर्यटन्—सर्वत्र विचरण करते हुए; तुष्ट-मना:—पूर्ण रूप से सन्तुष्ट; गत स्पृह:—समस्त भौतिक कामनाओं से पूर्ण रूप से मुक्त; कालम्—काल, समय की; प्रतीक्षन्—प्रतीक्षा करते हुए; विमद:—गर्व किये बिना; विमत्सर:—ईर्ष्यारहित ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भौतिक जगत की समस्त औपचारिकताओं की उपेक्षा करते हुए, मैं बारम्बार भगवान् के पवित्र नाम तथा यश का कीर्तन करने लगा। भगवान् की दिव्य लीलाओं का ऐसा कीर्तन एवं स्मरण कल्याणकारी होता है। इस तरह मैं पूर्ण रूप से सन्तुष्ट, विनम्र तथा ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर सारी पृथ्वी पर विचरण करने लगा।
 
तात्पर्य
 नारद मुनि ने अपने व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा भगवान् के निष्ठावान भक्त के जीवन का संक्षेप में वर्णन किया है। ऐसा भक्त भगवान् से या भगवान् के प्रामाणिक प्रतिनिधि से दीक्षा ग्रहण करने पर भगवान् की महिमा का गम्भीरतापूर्वक कीर्तन करता है और सारे संसार में विचरण करता है, जिससे अन्य लोग भी भगवान् की महिमा का श्रवण कर सकें। ऐसे भक्तों को भौतिक लाभ की कोई इच्छा नहीं रहती। उनकी एकमात्र इच्छा इच्छा होती है कि वे भगवान् के धाम को वापस जाँए।
यथासमय भौतिक शरीर को त्यागने पर उन्हें यह अवसर प्राप्त होता है। चूँकि भगवद्धाम को वापस जाना उनके जीवन का चरम लक्ष्य रहता है, अत: वे न तो किसी से ईर्ष्या करते हैं, न ही भगवद्धाम जाने के लिए सुयोग्य होने का उन्हें अभिमान होता है। उनका एकमात्र व्यवसाय भगवान् के पवित्र नाम, यश तथा लीलाओं का कीर्तन तथा स्मरण करना और अपनी वैयक्तिक क्षमता के अनुसार भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होकर दूसरों के कल्याण हेतु संदेश का प्रचार करना होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥