श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
कल्पान्त इदमादाय शयानेऽम्भस्युदन्वत: ।
शिशयिषोरनुप्राणं विविशेऽन्तरहं विभो: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
कल्प-अन्ते—ब्रह्मा के दिन के अन्त में; इदम्—यह; आदाय—लेकर, समेट कर; शयाने—शयन करते हुए; अम्भसि— कारण-जल में; उदन्वत:—विनाश, संहार; शिशयिषो:—भगवान् (नारायण) का लेटना; अनुप्राणम्—श्वास लेना; विविशे—प्रवेश किया; अन्त:—भीतर; अहम्—मैंने; विभो:—ब्रह्माजी के ।.
 
अनुवाद
 
 कल्प के अन्त में जब भगवान् नारायण प्रलय के जल में लेट गये, तब ब्रह्माजी समस्त सृष्टिकारी तत्त्वों सहित उनके भीतर प्रवेश करने लगे और उनके श्वास से मैं भी भीतर चला गया।
 
तात्पर्य
 नारद ब्रह्मा के पुत्र के रूप में उसी तरह विख्यात हैं, जिस प्रकार भगवान् कृष्ण वसुदेव के पुत्र-रूप में। भगवान् तथा नारद जैसे उनके मुक्त भक्तगण इस संसार में एक ही विधि से प्रकट होते हैं। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, भगवान् का जन्म तथा उनके कार्य- कलाप सभी दिव्य होते हैं। अत: प्रामाणिक अभिमत के अनुसार, ब्रह्मा के पुत्र के रूप में नारद का जन्म भी दिव्य लीला है। उनका प्राकट्य तथा तिरोधान व्यावहारिक रूप से भगवान् के समस्तरीय हैं। अत: भगवान् तथा उनके भक्त दिव्य व्यक्ति के रूप में एकसाथ एकमेव तथा भिन्न हैं। वे एक ही कोटि की दिव्यता से सम्बन्धित हैं।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥