श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
प्रगायत: स्ववीर्याणि तीर्थपाद: प्रियश्रवा: ।
आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
प्रगायत:—इस प्रकार गाते हुए; स्व-वीर्याणि—अपनी लीलाएँ; तीर्थ-पाद:—भगवान्, जिनके चरणकमल समस्त पुण्यों या पवित्रता के स्रोत हैं; प्रिय-श्रवा:—सुनने में सुखद; आहूत:—बुलाया गया; इव—मानो; मे—मुझको; शीघ्रम्— जल्दी ही; दर्शनम्—दर्शन; याति—प्रकट होता है; चेतसि—हृदय स्थल में ।.
 
अनुवाद
 
 ज्योंही मैं भगवान् श्रीकृष्ण की सुमधुर महिमा की पवित्र लीलाओं का कीर्तन करना प्रारम्भ करता हूँ, त्योंही वे मेरे हृदयस्थल में प्रकट हो जाते हैं मानो उनको बुलाया गया हो।
 
तात्पर्य
 परम पूर्ण भगवान् अपने दिव्य नाम, रूप, लीलाओं तथा उनकी शब्द ध्वनियों से भिन्न नहीं हैं। ज्योंही शुद्ध भक्त उनके नाम, रूप तथा लीलाओं का श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करते हुए शुद्ध भक्ति में लग जाता है, त्योंही भगवान् आध्यात्मिक दृष्टपटल (टेलीविजन) के द्वारा शुद्ध भक्त के हृदय रूपी दर्पण पर अपना प्रतिबिम्ब उसकी दिव्य आँखों के सामने दिखलाते हैं। अतएव शुद्ध भक्त जो भगवान् से दिव्य प्रेमाभक्ति के कारण जुड़ा रहता है, प्रतिक्षण भगवान् की उपस्थिति का अनुभव कर सकता है। यह सहज मनोविज्ञान है कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मुख से अपने यश का वर्णन सुनकर आनन्दित होना पसन्द करता है। यह सहज स्वभाव है और भगवान् भी अन्यों की भाँति एक व्यक्तित्व होने के कारण इस मनोविज्ञान से अलग नहीं हैं, क्योंकि हर व्यक्तिगत आत्मा में पाये जाने वाले मनोवैज्ञानिक लक्षण परम भगवान् के उसी मनोविज्ञान के प्रतिबिम्ब ही हैं। अन्तर केवल इतना है कि भगवान् सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं और अपने समस्त कार्यों में अलौकिक हैं। अत: यदि शुद्ध भक्त द्वारा अपने यश के गायन से भगवान् आकृष्ट होते हैं, तो इसमें कोई विस्मय नहीं होना चाहिए। चूँकि वे परम पूर्ण हैं, अत: वे अपने महिमा- गायन से प्रकट हो सकते हैं और ये दोनों बातें एक हैं। श्रील नारद भगवान् की महिमा का कीर्तन किसी निजी लाभ के लिए नहीं अपितु इसलिए करते हैं क्योंकि यह महिमा-गायन भगवान् से अभिन्न होता है। नारद मुनि अपने दिव्य कीर्तन से भगवान् के समक्ष पहुँच पाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥