श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
सूत उवाच
एवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम् ।
आमन्‍त्र्य वीणां रणयन् ययौ याद‍ृच्छिको मुनि: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; सम्भाष्य—सम्बोधित करके; भगवान्—सर्वशक्तिमान; नारद:—नारद मुनि; वासवी—वासवी (सत्यवती) के; सुतम्—पुत्र को; आमन्त्र्य—बुलाकर; वीणाम्—वीणा, वाद्ययन्त्र; रणयन्—झंकृत करते हुए; ययौ—चला गया; यादृच्छिक:—जहाँ इच्छा हो वहाँ; मुनि:—मुनि ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार व्यासदेव को सम्बोधित करके नारद मुनि ने उनसे विदा ली और अपनी वीणा को झंकृत करते हुए वे अपनी उन्मुक्त इच्छा के अनुसार विचरण करने के लिए चले गये।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक जीव पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता है, क्योंकि यह उसका दिव्य स्वभाव होता है। और यह स्वतन्त्रता भगवान् की दिव्य सेवा से ही प्राप्त की जा सकती है। बहिरंगा शक्ति से भ्रमित होकर, प्रत्येक व्यक्ति अपने को स्वतन्त्र समझता है, लेकिन वास्तव में वह प्रकृति के नियमों से बँधा होता है। जब बद्धजीव इसी संसार में मुक्त भाव से विचरण नहीं कर सकता, तो फिर उसके एक लोक से दूसरे लोकों में जाने के विषय में तो कहना ही क्या? लेकिन नारद जैसे पूर्ण मुक्त व्यक्ति, जो निरन्तर भगवान् के यशोगान में लगे हों, न केवल पृथ्वी पर विचरण करने के लिए स्वतन्त्र हैं, अपितु ब्रह्माण्ड के किसी भाग के साथ ही साथ वैकुण्ठ के किसी भी भाग में विचरण के लिए भी उन्मुक्त हैं। हम उनकी स्वतन्त्रता के प्रसार तथा असीमता की कल्पना ही कर सकते हैं, जो भगवान् की स्वतन्त्रता जैसी ही है। उनके विचरण का न कोई कारण है, न कोई दायित्व है और न ही कोई उन्हें मुक्त विचरण से रोक सकता है। इसी प्रकार, भक्तिमय सेवा की दिव्य पद्धति भी स्वतन्त्र है। सम्भव है कि सारी क्रियाओं के बावजूद भी किसी व्यक्ति में यह विकसित न हो सके। इसी प्रकार, भक्तों की संगति भी स्वतन्त्र है। हो सकता है कि किसी भाग्यशाली को यह प्राप्त हो या किसी को हजार प्रयत्नों के बाद भी यह प्राप्त न हो पाये। अत: भक्ति के समस्त पक्षों में स्वतन्त्रता ही मुख्य धुरी है। स्वतन्त्रता के बिना भक्ति नहीं हो सकती। भगवान् को अर्पित स्वतन्त्रता का अर्थ यह नहीं है कि भक्त सभी तरह से आश्रित है। गुरु के पारदर्शी माध्यम से भगवान् की शरण में जाना जीवन की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करना है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥