श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.6.4 
प्राक्कल्पविषयामेतां स्मृतिं ते मुनिसत्तम ।
न ह्येष व्यवधात्काल एष सर्वनिराकृति: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
प्राक्—पूर्ववर्ती; कल्प—ब्रह्मा के एक दिन का समय; विषयाम्—विषय वस्तु; एताम्—ये सब; स्मृतिम्—सुधि, याद; ते—तुम्हारी; मुनि-सत्तम—हे महामुनि; न—नहीं; हि—निश्चय ही; एष:—ये सब; व्यवधात्—अन्तर किया; काल:— समय आने पर; एष:—ये; सर्व—सभी; निराकृति:—संहार ।.
 
अनुवाद
 
 हे महामुनि, समय आने पर काल हर वस्तु का संहार कर देता है, अतएव यह कैसे सम्भव हुआ है कि यह विषय, जो ब्रह्मा के इस दिन के पूर्व घटित हो चुका है, अब भी आपकी स्मृति में काल द्वारा अप्रभावित जैसे का तैसा बना हुआ है?
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार भौतिक शरीर के विनाश के बाद भी आत्मा नष्ट नहीं होता,उसी तरह आध्यात्मिक चेतना भी नष्ट नहीं होती। श्री नारद ने पूर्व कल्प में, जब उन्हें यह शरीर प्राप्त था, तभी यह आध्यात्मिक चेतना विकसित कर ली थी। भौतिक शरीर की चेतना का अर्थ है, भौतिक शरीर के माध्यम द्वारा अभिव्यक्त की गई आध्यात्मिक चेतना। यह चेतना निकृष्ट, विनाशशील तथा विकृत होती है। लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर अतिमानस की पराचेतना आत्मा के समान ही श्रेष्ठ होती है और कभी विनष्ट नहीं होती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥