श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
शौनक उवाच
निर्गते नारदे सूत भगवान् बादरायण: ।
श्रुतवांस्तदभिप्रेतं तत: किमकरोद्विभु: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
शौनक: उवाच—श्री शौनक ने कहा; निर्गते—चले जाने पर; नारदे—नारद मुनि के; सूत—हे सूत; भगवान्—दिव्य रूप से सर्वशक्तिमान; बादरायण:—वेदव्यास ने; श्रुतवान्—सुना; तत्—उसका; अभिप्रेतम्—मन की इच्छा, मनोवांछा; तत:—तत्पश्चात्; किम्—क्या; अकरोत्—किया; विभु:—महान् ने ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषि शौनक ने पूछा : हे सूत, जब महान् तथा दिव्य रूप से शक्तिमान व्यासदेव ने श्री नारद मुनि से सब कुछ सुन लिया, तो फिर नारद के चले जाने पर व्यासदेव ने क्या किया?
 
तात्पर्य
 इस अध्याय में श्रीमद्भागवत के वर्णन किये जाने के लिए संकेत मिलता है, क्योंकि महाराज परीक्षित को अपनी माता के गर्भ में चमत्कारिक ढंग से बचा लिए गये थे। यह घटना आचार्य द्रोण के पुत्र द्रौणि (अश्वत्थामा) के कारण घटित हुई
जिसने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए में मार डाला और जिसके लिए अर्जुन ने उसे दंडित किया। इस महापुराण श्रीमद्भागवत का शुभारम्भ करने के पूर्व, श्री व्यासदेव ने समाधि द्वारा सारे सत्य की अनुभूति प्राप्त कर ली।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥