श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
तदा शुचस्ते प्रमृजामि भद्रे
यद्ब्रह्मबन्धो: शिर आततायिन: ।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैरुपाहरे
त्वाक्रम्य यत्‍स्‍नास्यसि दग्धपुत्रा ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
तदा—उस समय; शुच:—शोक के आँसू; ते—तुम्हारे; प्रमृजामि—पोंछ दूँगा; भद्रे—हे भद्र स्त्री; यत्—जब; ब्रह्म बन्धो:—पतित ब्राह्मण का; शिर:—सिर; आततायिन:—आततायी का; गाण्डीव-मुक्तै:—गांडीव नामक धनुष से छोड़े गये; विशिखै:—बाणों से; उपाहरे—तुम्हें भेंट करूँगा; त्वा—तुम स्वयं; आक्रम्य—उस पर चढ़ कर; यत्—जो; स्नास्यसि—स्नान करोगी; दग्ध-पुत्रा—पुत्रों को दाह देने के बाद ।.
 
अनुवाद
 
 हे देवी, जब मैं अपने गाण्डीव धनुष से छोड़े गये तीरों से उस ब्राह्मण का सिर काट के तुम्हें भेंट करूँगा, तभी मैं तुम्हारी आँखों से आँसू पोछूँगा और तुम्हें सान्त्वना प्रदान करूँगा। तब तुम अपने पुत्रों के शरीरों का दाह करने के बाद उसके सिर पर खड़ी होकर स्नान करना।
 
तात्पर्य
 कोई शत्रु जो घर में आग लगाता है, विष खिलाता है, अचानक घातक शस्त्रों से प्रहार करता है, सम्पत्ति लूटता है या कृषि-योग्य खेतों पर अनुचित अधिकार जमा लेता है, किसी की पत्नी को फाँसता है, वह आततायी है। ऐसा आततायी, चाहे वह ब्राह्मण हो या ब्राह्मण का तथाकथित पुत्र ही क्यों न हो, सब प्रकार से दण्डनीय है। जब अर्जुन ने अश्वत्थामा नामक आततायी का शिर काटने की प्रतिज्ञा की, तो वह भलीभाँति जानता था कि अश्वत्थामा ब्राह्मण का पुत्र है, लेकिन चूँकि उस तथाकथित ब्राह्मण ने कसाई जैसा कार्य किया था, अत: वह आततायी था और ऐसे धूर्त ब्राह्मण के पुत्र को मारने में कोई पाप नहीं था।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥