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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.7.17 
इति प्रियां वल्गुविचित्रजल्पै:
स सान्‍त्वयित्वाच्युतमित्रसूत: ।
अन्वाद्रवद्दंशित उग्रधन्वा
कपिध्वजो गुरुपुत्रं रथेन ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस तरह; प्रियाम्—प्रियतमा को; वल्गु—मीठे; विचित्र—तरह-तरह के; जल्पै:—कथनों द्वारा; स:—वह; सान्त्वयित्वा—सान्त्वना देकर, प्रसन्न करके; अच्युत-मित्र-सूत:—अर्जुन ने, जिसका मार्गदर्शन अच्युत भगवान् मित्र तथा सारथी के रूप में करते हैं; अन्वाद्रवत्—पीछा किया; दंशित:—कवच द्वारा सुरक्षित; उग्र-धन्वा—भयानक अस्त्रों से सज्जित; कपि-ध्वज:—अर्जुन; गुरु-पुत्रम्—अपने गुरु के पुत्र को; रथेन—रथ पर आरूढ़ होकर ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार, मित्र तथा सारथी के रूप में अच्युत भगवान् द्वारा मार्गदर्शित किए जाने वाले अर्जुन ने अपनी प्रियतमा को ऐसे कथनों से तुष्ट किया। तब उसने अपना कवच धारण किया और भयानक अस्त्र-शस्त्रों से लैस होकर, वह अपने रथ पर चढ़ कर अपने गुरुपुत्र अश्वत्थामा का पीछा करने के लिए निकल पड़ा।
 
 
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