श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
यदाशरणमात्मानमैक्षत श्रान्तवाजिनम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो मेने आत्मत्राणं द्विजात्मज: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; अशरणम्—जिसके कोई आश्रय न हो; आत्मानम्—अपने को; ऐक्षत—देखा; श्रान्त-वाजिनम्—थके हुए घोड़े; अस्त्रम्—हथियार; ब्रह्म-शिर:—सर्वोच्च या परम (आणविक ) ; मेने—प्रयुक्त किया; आत्म-त्राणम्—अपनी रक्षा के लिए; द्विज-आत्म-ज:—ब्राह्मण के पुत्र ने ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्राह्मण के पुत्र (अश्वत्थामा) ने देखा कि उसके घोड़े थक गये हैं तो उसने सोचा कि अब उसके पास अनन्तिम अस्त्र ब्रह्मास्त्र (आणविक हथियार) का प्रयोग करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया।
 
तात्पर्य
 अन्तत: जब कोई विकल्प नहीं रह जाता, तभी ब्रह्मास्त्र नामक परमाणु हथियार का प्रयोग किया जाता है। यहाँ पर द्विजात्मज: शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अश्वत्थामा द्रोणाचार्य का पुत्र होते हुए भी सुयोग्य ब्रह्माण न था। सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति ब्राह्मण कहलाता है और यह कोई वंशानुगत उपाधि नहीं है। अश्वत्थामा पहले भी ब्रह्म-बन्धु कहलाता था। ब्राह्मण का मित्र होने का यह अर्थ नहीं है कि वह योग्यता में भी ब्राह्मण हो। ब्राह्मण का मित्र या पुत्र पूर्ण रूप से योग्य होने पर ही ब्राह्मण कहला सकता है, अन्यथा नहीं। चूँकि अश्वत्थामा का निर्णय अप्रौढ़ता भरा है, अतएव उसे यहाँ जानबूझ कर ब्राह्मण का पुत्र कहा गया है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥