श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
अथोपस्पृश्य सलिलं सन्दधे तत्समाहित: ।
अजानन्नपि संहारं प्राणकृच्छ्र उपस्थिते ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अथ—इस प्रकार; उपस्पृश्य—पवित्रता के लिए स्पर्श; सलिलम्—जल; सन्दधे—मंत्र पढ़ा; तत्—वह; समाहित:— ध्यान में मग्न; अजानन्—बिना जाने; अपि—यद्यपि; संहारम्—वापसी; प्राण-कृच्छ्रे—प्राण संकट; उपस्थिते—होने पर ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि उसके प्राण संकट में थे, अतएव उसने अपने को पवित्र करने के लिए जल का स्पर्श किया और ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए मन्त्रोच्चार में अपना ध्यान एकाग्र किया, यद्यपि उसे इस अस्त्र को वापस लाने की विधि ज्ञात न थी।
 
तात्पर्य
 भौतिक कार्यकलापों के सूक्ष्म रूप भौतिक कार्य पद्धति की स्थूलतर विधियों से अधिक सूक्ष्म होते हैं। इस तरह के भौतिक कार्यकलापों के ऐसे सूक्ष्म रूप
ध्वनि की शुद्धि द्वारा प्राप्त किये जाते हैं। यहाँ पर ब्रह्मास्त्र को मंत्रोच्चार द्वारा क्रियाशील करने के लिए इसी विधि को अपनाया गया है।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥