श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
त्वमाद्य: पुरुष: साक्षादीश्वर: प्रकृते: पर: ।
मायां व्युदस्य चिच्छक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम् आद्य:—आप आदि; पुरुष:—भोक्ता पुरुष हैं; साक्षात्—प्रत्यक्ष; ईश्वर:—नियन्ता; प्रकृते:—भौतिक प्रकृति के; पर:—दिव्य; मायाम्—भौतिक शक्ति को; व्युदस्य—दूर भगा कर; चित्-शक्त्या—अन्तरंगा शक्ति के बल से; कैवल्ये—शुद्ध शाश्वत ज्ञान तथा आनन्द में; स्थित:—स्थित; आत्मनि—अपने ।.
 
अनुवाद
 
 आप आदि भगवान् हैं जिनका समस्त सृष्टियों में विस्तार है और आप भौतिक शक्ति से परे हैं। आपने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से भौतिक शक्ति के सारे प्रभावों को दूर भगा दिया है। आप निरन्तर शाश्वत आनन्द तथा दिव्य ज्ञान में स्थित रहते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, वह अविद्या के चंगुल से छूट सकता है। कृष्ण सूर्य के तुल्य हैं और माया या भौतिक जगत अंधकार के तुल्य है। जहाँ-जहाँ सूर्य का प्रकाश जाता है, वहाँ-वहाँ से अंधकार या अज्ञान तुरन्त दूर हो जाता है। यहाँ पर अज्ञान के संसार से निकलने का सर्वश्रेष्ठ उपाय सुझाया गया है। यहाँ पर भगवान् को आदि परमेश्वर कहा गया है। उन्हीं से अन्य सारे अवतारों का विस्तार होता है। सर्वव्यापी भगवान् विष्णु भगवान् कृष्ण के पूर्ण अंश या विस्तार हैं। भगवान् अपनी नानाप्रकार की शक्तियों सहित ईश्वर तथा जीवों के असंख्य रूपों में अपना विस्तार करते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण मूल आदि भगवान् हैं, जिनसे प्रत्येक वस्तु का उद्भव होता है। इस दृश्य जगत में भगवान् का जो सर्वव्यापी रूप दिखलाई पड़ता है, वह भी भगवान् की ही आंशिक अभिव्यक्ति है। अतएव परमात्मा भगवान् में ही सन्निहित हैं। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। उन्हें भौतिक जगत के कर्मों तथा फलों से कोई सरोकार नहीं होता, क्योंकि वे भौतिक सृष्टि से बहुत ऊपर हैं। अंधकार सूर्य का विकृत (उल्टा) रूप है, अतएव अंधकार का अस्तित्व सूर्य के अस्तित्व पर निर्भर करता है, लेकिन सूर्य में अंधकार का नामोनिशान नहीं होता। जिस प्रकार सूर्य केवल प्रकाश से ओतप्रोत होता है, उसी प्रकार भगवान् इस भौतिक जगत से परे रहकर, आनन्द से ओतप्रोत रहते हैं। वे न केवल आनन्द से परिपूर्ण हैं, अपितु दिव्य विविधता से भी ओतप्रोत हैं। दिव्यता तनिक भी गतिहीन नहीं है, बल्कि गतिशील विविधता से युक्त है। वे भौतिक प्रकृति से भिन्न हैं, क्योंकि भौतिक प्रकृति तीन गुणों के कारण जटिल बनी रहती है। वे परम या प्रधान हैं, अत: वे पूर्ण हैं। उनकी अनेक शक्तियाँ हैं और वे अपनी विविध शक्तियों के द्वारा संसार का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं। लेकिन उनके अपने धाम में सब कुछ सनातन तथा पूर्ण है। यह संसार केवल शक्तियों या शक्तिशाली प्रतिनिधियों द्वारा संचालित न होकर सर्वशक्तिमान के द्वारा उनकी समस्त शक्तियों सहित संचालित होता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥