श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
न ह्यस्यान्यतमं किञ्चिदस्त्रं प्रत्यवकर्शनम् ।
जह्यस्त्रतेज उन्नद्धमस्त्रज्ञो ह्यस्त्रतेजसा ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निश्चय ही; अस्य—इसका; अन्यतमम्—अन्य; किञ्चित्—कुछ भी; अस्त्रम्—हथियार; प्रति—विपरीत; अवकर्शनम्—प्रतिक्रिया करने वाला; जहि—शमन करो; अस्त्र-तेज:—इस हथियार का तेज; उन्नद्धम्—अत्यन्त शक्तिशाली; अस्त्र-ज्ञ:—सैन्य विज्ञान में पटु; हि—निश्चय रूप से; अस्त्र-तेजसा—तुम्हारे हथियार के प्रभाव से ।.
 
अनुवाद
 
 हे अर्जुन, केवल दूसरा ब्रह्मास्त्र ही इस अस्त्र को निरस्त कर सकता है। चूँकि तुम सैन्य विज्ञान में अत्यन्त पटु हो, अतएव अपने अस्त्र की शक्ति से इस अस्त्र के तेज का शमन करो।
 
तात्पर्य
 परमाणु बमों के प्रभावों को निरस्त करने वाला कोई प्रति-अस्त्र नहीं है। लेकिन सूक्ष्म विज्ञान द्वारा ब्रह्मास्त्र के प्रभाव को प्रशमित किया जा सकता है और उन दिनों जो लोग सैन्य विज्ञान
में पटु होते थे, वे ब्रह्मास्त्र का शमन कर सकते थे। द्रोण-पुत्र इस अस्त्र को प्रशमित करने की कला नहीं जानता था, अतएव अर्जुन को अपने अस्त्र से इसे प्रशमित करने का आदेश मिला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥