श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम् ।
बबन्धामर्षताम्राक्ष: पशुं रशनया यथा ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; आसाद्य—बन्दी बनाकर; तरसा—कौशल से; दारुणम्—खतरनाक; गौतमी-सुतम्—गौतमी पुत्र को; बबन्ध—बाँध लिया; अमर्ष—क्रुद्ध; ताम्र-अक्ष:—लाल-लाल आँखें; पशुम्—पशु को; रशनया—रस्सियों से; यथा— जिस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 ताँबे के दो लाल तप्त गोलों के समान क्रोध से प्रज्वलित आँखें किये, अर्जुन ने अत्यन्त दक्षतापूर्वक से गौतमी के पुत्र को बन्दी बना लिया और उसे रस्सियों से पशु की तरह बाँध लिया।
 
तात्पर्य
 अश्वत्थामा की माता कृपी का जन्म गौतम कुल में हुआ था। इस श्लोक की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अश्वत्थामा को पकडक़र पशु की भाँति रस्सी से बाँध दिया गया। श्रीधर स्वामी के मतानुसार, अर्जुन को अपने धर्म का पालन करने के लिए, इस ब्राह्मण पुत्र को पशु की भाँति पकडऩा पड़ा। श्रीधर स्वामी के इस प्रस्ताव की पुष्टि बाद में श्रीकृष्ण के कथन से भी हो जाती है। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य तथा कृपी का वैध पुत्र था, परन्तु उसने अपने जीवन को पतित बना लिया था, अतएव उसके साथ ब्राह्मण के तुल्य नहीं, अपितु पशुतुल्य व्यवहार करना ही उचित था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥