श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
तदसौ वध्यतां पाप आतताय्यात्मबन्धुहा ।
भर्तुश्च विप्रियं वीर कृतवान् कुलपांसन: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अत:; असौ—यह आदमी; वध्यताम्—मारा जाएगा; पाप:—पापी; आततायी—हमला करने वाला; आत्म— अपने; बन्धु-हा—पुत्रों को मारने वाला; भर्तु:—स्वामी का; च—भी; विप्रियम्—संतुष्ट न करके; वीर—हे योद्धा; कृतवान्—करने वाला; कुल-पांसन:—कुल की राख ।.
 
अनुवाद
 
 यह आदमी तुम्हारे ही कुल के सदस्यों का हत्यारा तथा वधकर्ता (आततायी) है। यही नहीं, उसने अपने स्वामी को भी असंतुष्ट किया है। वह अपने कुल की राख (कुलांगार) है। तुम तत्काल इसका वध कर दो।
 
तात्पर्य
 द्रोणचार्य के पुत्र को यहाँ पर कुलांगार कहा गया है। द्रोणाचार्य के नाम का अत्यधिक सम्मान था। यद्यपि वे शत्रु पक्ष में चले गये थे, फिर भी सारे पाण्डव उनका सम्मान करते थे और अर्जुन ने तो युद्ध आरम्भ होने के पूर्व उन्हें नमस्कार किया था। ऐसा करने में कोई खराबी नहीं थी। लेकिन द्रोणाचार्य के पुत्र ने ऐसा कृत्य करके अपने को पतित बना लिया था, जिसे द्विज द्वारा कभी नहीं किया जाता। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों की सोते हुए में हत्या की थी, जिससे उसने अपने स्वामी दुर्योधन
को भी अप्रसन्न कर दिया था, क्योंकि उसने कभी भी पाण्डवों के सोते हुए पाँचों पुत्रों की हत्या के जघन्य कृत्य की अनुमति नहीं दी थी। इसका अर्थ यह हुआ कि वह अर्जुन के ही कुटुम्बियों का वधकर्ता बन गया, अतएव वह अर्जुन द्वारा दण्डनीय था। शास्त्रों का कथन है कि जो बिना चेतावनी के आक्रमण करता है, पीछे से वार करके मार डालता है, दूसरे के घर में आग लगाता है, किसी अन्य की पत्नी का अपहरण करता है, वह वध-योग्य है। कृष्ण ने अर्जुन को ये तथ्य याद दिलाए, जिससे वह उन पर ध्यान दे और तदनुसार कार्यवाही करे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥