श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
तथाहृतं पशुवत् पाशबद्ध-
मवाङ्‍मुखं कर्मजुगुप्सितेन ।
निरीक्ष्य कृष्णापकृतं गुरो: सुतं
वामस्वभावा कृपया ननाम च ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—इस प्रकार; आहृतम्—लाया गया; पशु-वत्—पशु के समान; पाश-बद्धम्—रस्सियों से बँधा; अवाक्-मुखम्— मुँह से एक भी शब्द निकले बिना; कर्म—कार्य; जुगुप्सितेन—घृणित होने के कारण; निरीक्ष्य—देखकर; कृष्णा— द्रौपदी; अपकृतम्—अधर्म कार्य करने वाला; गुरो:—गुरु के; सुतम्—पुत्र को; वाम—सुन्दर; स्वभावा—स्वभाव वाली; कृपया—दयावश; ननाम—प्रणाम किया; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 श्री सूत गोस्वामी ने कहा : तब द्रौपदी ने अश्वत्थामा को देखा, जो पशु की भाँति रस्सियों से बँधा था और अत्यन्त घृणित हत्या का कृत्य करने के कारण चुप था। अपने स्त्री स्वभाववश तथा स्वभाव से उत्तम एवं भद्र होने के कारण, उसने ब्राह्मण रूप में उसके प्रति सम्मान व्यक्त किया।
 
तात्पर्य
 अश्वत्थामा की भर्त्सना स्वयं भगवान् कर चुके थे और अर्जुन ने उसके साथ ब्राह्मण या गुरु पुत्र के समान नहीं, अपितु अपराधी जैसा बर्ताव किया था। लेकिन जब उसे श्रीमती द्रौपदी के समक्ष लाया गया, तो अपने पुत्रों की हत्या से यद्यपि वह संतप्त थी और हत्यारा उसके समक्ष था, किन्तु वह ब्राह्मण या ब्राह्मण के पुत्र को सामान्य रूप से दिये जाने वाले सम्मान से उसे वंचित नहीं कर सकी। यह द्रौपदी के मृदुल नारी-स्वभाव के कारण था। स्त्री-जाति बालकों के समान होती है, अत: उसमें पुरुष की तरह भेदाभेद शक्ति नहीं होती। अश्वत्थामा ने अपने आपको द्रोणाचार्य या ब्राह्मण के पुत्र रूप में अयोग्य सिद्ध कर दिया था और इस कारण से भगवान् कृष्ण-जैसे सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक प्राधिकारी ने उसकी भर्त्सना की थी, लेकिन एक मृदु स्त्री ब्राह्मण के प्रति अपने स्वाभाविक सौजन्य को नहीं त्याग पाई।
आज भी हिन्दू परिवार में नारियाँ ब्राह्मण के प्रति समुचित आदर प्रदर्शित करती हैं, चाहे वह कितना ही पतित और नृंशस ब्रह्म-बन्धु क्यों न हो। लेकिन अब पुरुष वर्ग ऐसे ब्रह्म-बन्धु के प्रति विरोध करने लगे हैं, जो उत्तम ब्राह्मण कुलों में उत्पन्न तो होते हैं, लेकिन जिनके कार्य शूद्रों से भी घटकर होते हैं।

इस श्लोक में एक विशिष्ट शब्द वाम-स्वभावा प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है, “स्वभाव से मृदु तथा भद्र।” भद्र पुरुष या स्त्री कोई भी बात सरलता से स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन औसत बुद्धि का पुरुष ऐसा नहीं करपाता। लेकिन हमें भद्र बनने के उद्देश्य से अपनी तर्क तथा विवेक शक्ति नहीं खो देनी चाहिए। मनुष्य में किसी भी बात का उसके गुणों के अनुसार निर्णय करने के लिए अच्छी विवेक शक्ति होनी चाहिए। हमें मृदु स्त्री स्वभाव का अनुकरण नहीं करना चाहिए और इस तरह जो प्रामाणिक (असली) नहीं है, उसे स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए। भले ही उत्तम स्वभाव की स्त्री अश्वत्थामा का सम्मान करे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह सच्चे ब्राह्मण जैसा उत्तम है।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥