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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.7.44 
सरहस्यो धनुर्वेद: सविसर्गोपसंयम: ।
अस्त्रग्रामश्च भवता शिक्षितो यदनुग्रहात् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
स-रहस्य:—गोपनीय; धनु:-वेद:—धनुष-बाण चलाने की विद्या; स-विसर्ग—छोड़ते हुए; उपसंयम:—वश में करते हुए; अस्त्र—हथियार; ग्राम:—सभी प्रकार के; —तथा; भवता—अपने से; शिक्षित:—विद्वान; यत्—जिसकी; अनुग्रहात्—कृपा से ।.
 
अनुवाद
 
 यह द्रोणाचार्य की कृपा थी कि आपने धनुष बाण चलाने की विद्या तथा अस्त्रों को वश में करने की गुप्त कला सीखी।
 
तात्पर्य
 धनुर्वेद या सैन्य विज्ञान की शिक्षा द्रोणाचार्य द्वारा दी जाती थी, जिसमें वैदिक मन्त्रों द्वारा शस्त्रास्त्रों को चलाने तथा रोकने के रहस्य सम्मिलित होते थे। स्थूल सैन्य विज्ञान भौतिक अस्त्रों पर आश्रित है, लेकिन इस कला से भी सूक्ष्म कला है वैदिक मन्त्रों से सिक्त बाणों को चलाना, जो मशीनगनों या परमाणु बमों जैसे स्थूल भौतिक शस्त्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं। यह नियन्त्रण वैदिक मन्त्रों या ध्वनि के दिव्य विज्ञापन द्वारा किया जाता है। रामायण में कहा गया है कि भगवान् श्रीराम के पिता महाराज दशरथ केवल ध्वनि से बाणों का नियंत्रण करते थे। वे केवल ध्वनि सुनकर वस्तु को देखे बिना लक्ष्य को भेद सकते थे। अतएव यह आजकल प्रयुक्त होने वाले स्थूल भौतिक सैन्य हथियारों से कहीं सूक्ष्म सैन्य विज्ञान है। अर्जुन को इसकी शिक्षा दी गई थी, अतएव द्रौपदी चाहती थी कि अर्जुन इन सारे लाभों के लिए द्रोणाचार्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करे। द्रोणाचार्य की अनुपस्थिति में उनका पुत्र ही उनका प्रतिनिधि था। यह उस कुलीन नारी द्रौपदी का अभिमत था। यह तर्क किया जा सकता है कि द्रोणाचार्य जैसे कट्टर ब्राह्मण को सैन्य विज्ञान के शिक्षक क्यों बनाये गये थे? इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण को शिक्षक बनना चाहिए, चाहे वह विद्या के किसी भी विभाग को क्यों न जानता या सिखाता हो। विद्वान ब्राह्मण को शिक्षक, धर्मोपदेशक तथा दान का पात्र बनना चाहिए। प्रामाणिक ब्राह्मण ऐसे पेशे (व्यवसाय) ग्रहण करने के लिए अधिकृत हैं।
 
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