श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक
सूत उवाच
धर्म्यं न्याय्यं सकरुणं निर्व्यलीकं समं महत् ।
राजा धर्मसुतो राज्ञ्या: प्रत्यनन्दद्वचो द्विजा: ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; धर्म्यम्—धर्म के नियमों के अनुसार; न्याय्यम्—न्याय; स-करुणम्—करुणा से पूर्ण; निर्व्यलीकम्—धर्म में द्वैत के बिना; समम्—समता; महत्—गौरवशाली; राजा—राजा; धर्म-सुत:—पुत्र; राज्ञ्या:— महारानी द्वारा; प्रत्यनन्दत्—अनुमोदित; वच:—कथन; द्विजा:—हे ब्राह्मणो ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : हे ब्राह्मणो, राजा युधिष्ठिर ने रानी के वचनों का पूर्ण अनुमोदन किया, क्योंकि वे धर्म के नियमों के अनुसार न्यायोचित, गौरवशाली, दया तथा समता से पूर्ण एवं निष्कपट थे।
 
तात्पर्य
 महाराज युधिष्ठिर जो धर्मराज या यमराज के पुत्र थे, उन्होंने महारानी द्रौपदी के इन वचनों का अनुमोदन किया कि अर्जुन अश्वत्थामा को मुक्त कर दे। मनुष्य को चाहिए कि उच्च कुल के सदस्य की अवमानना को सहन न करे। अर्जुन तथा उसका परिवार द्रोणाचार्य के कुल के प्रति कृतज्ञ थे, क्योंकि अर्जुन ने उनसे धनुर्विद्या सीखी थी। यदि ऐसे उदार परिवार के प्रति कृतघ्नता प्रदर्शित की जाय, तो नैतिक दृष्टि से यह उचित न होगा। द्रोणाचार्य की अर्धांगिनी के साथ अनुकंपापूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए था, जिससे वह अपने पुत्र की मृत्यु के कारण दुखी न हो। यही अनुकंपा है। द्रौपदी के ये वचन बिना किसी कपट के हैं, क्योंकि पूरी तरह जानकर ही कोई कदम उठाना चाहिए। इसमें समता का भाव था, क्योंकि द्रौपदी ने निजी अनुभव के आधार पर यह कहा था। कोई बाँझ स्त्री कभी माता की पीड़ा नहीं समझ सकती। द्रौपदी स्वयं माता थी, अतएव कृपी की शोक-वेदना का उसका अनुमान सही था। यह उसके गौरव के अनुकूल भी था, क्योंकि वह उस उच्च कुल के प्रति समुचित सम्मान प्रदर्शित करना चाहती थी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥