श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक
निशम्य भीमगदितं द्रौपद्याश्च चतुर्भुज: ।
आलोक्य वदनं सख्युरिदमाहहसन्निव ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
निशम्य—सुनते ही; भीम—भीम द्वारा; गदितम्—कहा गया; द्रौपद्या:—द्रौपदी का; च—तथा; चतु:-भुज:—चार भुजाओं वाले (भगवान्) ने; आलोक्य—देखकर; वदनम्—मुख; सख्यु:—अपने मित्र का; इदम्—यह; आह—कहा; हसन्—हँसते हुए; इव—मानो ।.
 
अनुवाद
 
 भीम, द्रौपदी तथा अन्यों के वचन सुनकर, चतुर्भुज भगवान् ने अपने प्रिय सखा अर्जुन के मुँह की ओर देखा और मानो मुस्कुरा रहे हों, बोलना प्रारम्भ किया।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण के दो भुजाएँ थीं, किन्तु उन्हें चतुर्भुज क्यों कहा गया है, इसकी व्याख्या श्रीधर स्वामी ने की है। अश्वत्थामा के वध के सम्बन्ध में भीम तथा द्रौपदी दोनों के मत भिन्न-भिन्न थे। भीम उसे तुरन्त मार देना चाहता था, लेकिन द्रौपदी उसे बचाना चाहती थी। हम इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि भीम मारने के लिए तैयार है, किन्तु द्रौपदी उसे रोक रही है। अतएव इन दोनों को रोकने के लिए, भगवान् ने दो और भुजाएँ निकाल लीं। मूलत: आदि भगवान् श्रीकृष्ण दो भुजाएँ प्रदर्शित करते हैं, लेकिन उनके नारायण रूप में वे चार भुजाएँ प्रदर्शित करते हैं। वे अपने नारायण रूप में अपने भक्तों के साथ वैकुण्ठलोक में रहते हैं, जबकि अपने मूल श्रीकृष्ण रूप में वे कृष्णलोक में निवास करते हैं जो आध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठलोक से बहुत ऊपर है। अत: यदि श्रीकृष्ण को चतुर्भुज कहा गया है तो इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। यदि आवश्यकता पड़े तो वे सैकड़ों भुजाओं वाले बन सकते हैं, जैसाकि उन्होंने अर्जुन को अपने विश्वरूप में दिखलाया था। अतएव जो सैकड़ों, हजारों भुजाएँ प्रदर्शित कर सकते हैं, वे आवश्यकता पडऩे पर चार भुजाएँ भी प्रदर्शित कर सकते हैं।

अर्जुन जब असमंजस में था कि अश्वत्थामा का क्या किया जाय तो अर्जुन के परम प्रिय मित्र श्रीकृष्ण ने इस समस्या का हल ढूँढ निकालने का भार अपने ऊपर ले लिया और वे मुस्कुरा भी रहे थे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥