श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 6

 
श्लोक
अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अनर्थ—फालतू चीजें; उपशमम्—बहिष्कार, निवारण; साक्षात्—प्रत्यक्ष; भक्ति-योगम्—भक्ति को जोडऩे की विधि; अधोक्षजे—दिव्य को; लोकस्य—सामान्य लोगों का; अजानत:—न जानने वाले; विद्वान्—प्रकाण्ड पंडित; चक्रे— संकलन किया; सात्वत—परम सत्य के प्रसंग में; संहिताम्—वैदिक साहित्य ।.
 
अनुवाद
 
 जीव के भौतिक कष्ट, जिन्हें वह अनर्थ समझता है, भक्तियोग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कम किये जा सकते हैं। किन्तु अधिकांश जन इसे नहीं जानते; इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इस वैदिक साहित्य का संकलन किया है, जिसका सम्बन्ध परम सत्य से है।
 
तात्पर्य
 श्रील व्यासदेव ने परम पूर्ण भगवान् को देखा। इस कथन से यह सुझाव मिलता है कि भगवान् की पूर्ण इकाई में उनके अंश-प्रत्यंश भी सम्मिलित रहते हैं। अतएव उन्होंने उनकी विभिन्न शक्तियों को अर्थात् अन्तरंगा, तटस्था तथा बहिरंगा शक्तियों को देखा। उन्होंने उनके पूर्ण अंश तथा इनके भी अंशों अर्थात् उनके विभिन्न अवतारों को भी देखा और उन्होंने विशेष रूप से बहिरंगा शक्ति से मोहग्रस्त बद्धजीवों के अवांछित कष्टों को देखा। अन्त में उन्होंने बद्धजीवों के उपचार को भी देखा, जो भक्तियोग है। यह एक महान् दिव्य विज्ञान है और भगवान् के नाम, यश, कीर्ति आदि के श्रवण तथा कीर्तन से प्रारम्भ
होता है। सुप्त ईश्वर-प्रेम की पुनर्जागृति केवल श्रवण तथा कीर्तन की यांत्रिक पद्धति पर अवलम्बित नहीं होती, अपितु पूर्ण रूप से केवल भगवान् की अहैतुकी कृपा पर निर्भर करती है। जब भगवान् भक्त की निष्ठा से पूर्ण रूप से प्रसन्न होते हैं, तब वे उसे दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान कर सकते हैं। लेकिन श्रवण तथा कीर्तन की संस्तुत विधियों से भी भौतिक जगत के व्यर्थ तथा अवांछित दुखों को तुरन्त कम किया जा सकता है। भौतिक आसक्ति का इस तरह दूर होना दिव्य ज्ञान के विकसित होने की प्रतीक्षा नहीं करता, अपितु ज्ञान परम सत्य की चरम अनुभूति के लिए भक्तिमय सेवा पर निर्भर होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥