श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे ।
भक्तिरुत्पद्यते पुंस: शोकमोहभयापहा ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
यस्याम्—यह वैदिक साहित्य; वै—निश्चय ही; श्रूयमाणायाम्—मात्र श्रवण करने से; कृष्णे—भगवान् कृष्ण में; परम— परम; पूरुषे—भगवान् में; भक्ति:—भक्ति की भावनाएँ; उत्पद्यते—अंकुरित होते हैं; पुंस:—जीव का; शोक—संताप; मोह—मोह; भय—डर; अपहा—भगाने वाला, नष्ट करने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 इस वैदिक साहित्य के श्रवण मात्र से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेमा भक्ति की भावना तुरन्त अंकुरित होती है, जो शोक, मोह तथा भय की अग्नि को तुरन्त बुझा देती है।
 
तात्पर्य
 इन्द्रियाँ तो अनेक हैं, लेकिन इनमें से कान सर्वाधिक प्रभावशाली है। यह इन्द्रिय प्रगाढ़ निद्रा के समय भी कार्य करती है। मनुष्य जागृत रहते हुए शत्रु से अपनी रक्षा कर सकता है, लेकिन निद्राधीन होने पर केवल कान ही रक्षा करते हैं। यहाँ पर जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के सम्बन्ध में श्रवण का महत्त्व बताया गया है, जो है तीनों भौतिक तापों से मुक्ति। प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षण शोकसन्तप्त रहता है, वह भ्रामक वस्तुओं की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ता रहता है और अपने कल्पनिक शत्रु से सदैव भयभीत रहता है। भौतिक रोग के ये मूलभूत लक्षण हैं। यहाँ पर यह स्पष्ट सुझाव है कि केवल श्रीमद्भागवत का सन्देश सुनने से ही, भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति उत्पन्न हो जाती है और ऐसा होते ही भव रोग के लक्षण दूर हो जाते हैं। श्रील व्यासदेव ने परम पूर्ण भगवान् को देखा था और इस कथन से भगवान् श्रीकृष्ण के परम पूर्ण व्यक्तित्व की स्पष्ट पुष्टि होती है।

भक्तिमय सेवा का अन्तिम फल भगवान् के प्रति सच्चा प्रेम उत्पन्न करना है। प्रेम शब्द ऐसा है जो प्राय: स्त्री तथा पुरुष के सम्बन्ध को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। किन्तु प्रेम ही एकमात्र ऐसा शब्द है, जिससे भगवान् कृष्ण तथा जीवों के बीच के सम्बन्ध को समुचित ढंग से व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। भगवद्गीता में जीवों को प्रकृति कहा गया है और संस्कृत में प्रकृति शब्द स्त्रीवाचक है। भगवान् को सदैव परम पुरुष या सर्वोपरि पुरुषवाचक व्यक्तित्व कहा जाता है। अतएव भगवान् तथा जीवों के बीच का प्रेम लगभग पुरुष तथा स्त्री के बीच के प्रेम जैसा है। अतएव ईश्वर-प्रेम शब्द अत्यन्त उपयुक्त है।

भगवान् की प्रेमाभक्ति भगवान् के विषय में श्रवण करने से प्रारम्भ होती है। भगवान् तथा उनके विषय में सुनी गई विषय-वस्तु में कोई अन्तर नहीं होता। भगवान् सभी प्रकार से पूर्ण हैं, और इस प्रकार उनमें तथा उनके विषय में सुनी गई विषय-वस्तु में कोई अन्तर नहीं है। अतएव उनके विषय में श्रवण करने का अर्थ है दिव्य शब्द के उच्चारण की प्रक्रिया के द्वारा उनसे त्वरित सम्पर्क होना और यह दिव्य शब्द ध्वनि इतनी प्रभावशाली होती है कि वह उपर्युक्त समस्त भौतिक प्रभावों को दूर करके तुरन्त असर दिखाती है। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, जीवात्मा भौतिक संगति के द्वारा एक प्रकार की जटिलता (उलझन) उत्पन्न कर लेता है और भौतिक देह के भ्रामक बन्धन को वास्तविक तथ्य के रूप में स्वीकार करने लगता है। ऐसी झूठी जटिलता के कारण ही विभिन्न योनियों के जीव भिन्न-भिन्न माध्यमों से मोहित होते रहते हैं। यहाँ तक कि मनुष्य जीवन की सर्वाधिक विकसित अवस्था में भी वही मोह (भ्रम) अनेक प्रकार के वादों के रूप में चलता रहता है और भगवान् के साथ प्रेममय सम्बन्ध को विभाजित करता है और इस तरह मनुष्य-मनुष्य के बीच के प्रेममय सम्बन्ध भी बँट जाते हैं। श्रीमद्भागवत की कथा सुनने से भौतिकता की यह झूठी जटिलता दूर हो जाती है और समाज में वास्तविक शान्ति का शुभारम्भ होता है, जिसकी कामना राजनेताओं द्वारा अनेक राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ी उत्सुकता से की जाती है। सारे राजनेता मनुष्य तथा मनुष्य, राष्ट्र तथा राष्ट्र के बीच शान्तिपूर्ण स्थिति की कामना करते रहते हैं, लेकिन साथ ही साथ भौतिक प्रभुता के प्रति अत्यधिक आसक्ति होने के कारण उनमें मोह तथा भयग्रस्तता बनी रहती है। अतएव राजनेताओं के शान्ति सम्मेलनों से समाज में शान्ति स्थापित नहीं की जा सकती। इसकी स्थापना तो श्रीमद्भागवत में वर्णित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की कथा के श्रवण मात्र से ही की जा सकती है। ये मूर्ख राजनेता भले ही सदियों तक शान्ति तथा शिखर सम्मेलन क्यों न करते रहें, लेकिन वे इसे प्राप्त करने में विफल ही रहेंगें। जब तक हम कृष्ण के साथ अपने विसरे सम्बन्ध की पुन: स्थापना नहीं कर लेते, तब तक शरीर को स्व: मानने का मोह (भ्रम) बना रहेगा और इस तरह भयग्रस्तता भी बनी रहेगी। जहाँ तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में श्रीकृष्ण की वैधता का प्रश्न है, शास्त्रों में ऐसे सैकड़ो और हजारों साक्ष्य उपलब्ध हैं और वृन्दावन, नवद्वीप तथा पुरी जैसे विभिन्न स्थानों के भक्तों के निजी अनुभवों से सैकड़ो और हजारों प्रमाण मिलते हैं। कौमुदी कोश में भी कृष्ण के पर्यायवाची शब्दों में यशोदानन्दन तथा परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् दिये गये हैं। निष्कर्ष यह है कि वैदिक साहित्य श्रीमद्भागवत के श्रवण मात्र से ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित हो जाता है जिससे मनुष्य सांसारिक दुख, मोह तथा भय को लाँध करके जीवन की परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। जिसने वास्तविक रूप में विनीत भाव से श्रीमद्भागवत का पाठ सुना है, उसके लिए ये व्यावहारिक परीक्षाएँ हैं।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥