श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो ।
कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
अभिद्रवति—ओर आता हुआ; माम्—मेरी; ईश—हे प्रभु; शर:—बाण; तप्त—अग्नितुल्य; अयस:—लोह; विभो—हे महान्; कामम्—इच्छा; दहतु—जला दे; माम्—मुझको; नाथ—हे रक्षक; मा—मत; मे—मेरा; गर्भ:—गर्भ; निपात्यताम्—गर्भपात हो ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप सर्वशक्तिमान हैं। एक दहकता हुआ लोहे का बाण मेरी ओर तेजी से आ रहा है। मेरे प्रभु, यदि आपकी इच्छा हो तो यह मुझे भले ही जला दे, लेकिन यह मेरे गर्भ को जलाकर गर्भपात न करे। हे प्रभु, कृपया मेरे पर इतना अनुग्रह करें।
 
तात्पर्य
 यह घटना उत्तरा के पति, अभिमन्यु की मृत्यु के बाद की है। अभिमन्यु की विधवा पत्नी उत्तरा अपने पति का अनुसरण करती, लेकिन वह गर्भिणी थी और परम भगवद्भक्त महाराज परीक्षित उसके गर्भ में थे, अतएव उनकी रक्षा करना उसका परम धर्म था। माता के ऊपर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व होता है कि वह शिशु की सभी तरह से रक्षा करे, अतएव भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी बात कहने में उत्तरा लजायी नहीं। उत्तरा एक महान राजा की पुत्री, एक महान् वीर की पत्नी और एक महान भक्त की शिष्या थी। बाद में वह एक श्रेष्ठ राजा की माँ भी बनी। वह सभी प्रकार से भाग्यशालिनी थी।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥