श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 13

 
श्लोक
व्यसनं वीक्ष्य तत्तेषामनन्यविषयात्मनाम् ।
सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभु: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
व्यसनम्—महान संकट को; वीक्ष्य—देखकर; तत्—उस; तेषाम्—उनका; अनन्य—दूसरा नहीं; विषय—साधन; आत्मनाम्—इस प्रकार प्रवृत्त; सुदर्शनेन—कृष्ण के चक्र द्वारा; स्व-अस्त्रेण—हथियार से; स्वानाम्—अपने भक्तों की; रक्षाम्—सुरक्षा; व्यधात्—की; विभु:—सर्वशक्तिमान ने ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण ने यह देखकर कि उनके अनन्य भक्तों पर, जो पूर्ण रूप से उनके शरणागत थे, महान् संकट आनेवाला है, उनकी रक्षा के लिए तुरन्त ही अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया।
 
तात्पर्य
 अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र परमाणु अस्त्र के समान तो था, लेकिन उसमें तेज तथा उष्मा अधिक थी। यह ब्रह्मास्त्र अधिक सूक्ष्म विज्ञान की देन है, जो सूक्ष्म ध्वनि अर्थात् वेदों में अंकित एक मन्त्र का प्रतिफल है। इस अस्त्र का दूसरा गुण यह है कि यह परमाणु बम के समान अन्धा नहीं होता, क्योंकि अन्य किसी पर क्षति के बिना केवल लक्ष्य पर ही इसका संधान किया जा सकता है। अश्वत्थामा ने इसे पाण्डु-कुल के समस्त पुरुष-व्यक्तियों को समाप्त करने के लिए छोड़ा था, अतएव एक तरह से यह परमाणु बमों से अधिक घातक था, क्योंकि यह सर्वाधिक सुरक्षित स्थान में भी प्रवेश कर सकता था और लक्ष्य को कभी नहीं चूकता था। यह सब जानते हुए, भगवान् श्रीकृष्ण ने तुरन्त ही अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए अपना निजी अस्त्र उठा लिया, क्योंकि ये भक्त कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते थे। भगवद्गीता में भगवान् ने स्पष्ट रूप से वचन दिया है कि उनके भक्त कभी विनष्ट नहीं होते।
वे भक्तों द्वारा की गई भक्तिमय सेवा की मात्रा या गुण के आधार पर कार्यवाही करते हैं। यहाँ पर अनन्य विषयात्मनाम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। पाण्डवगण स्वयं महान योद्धा होते हुए भी भगवान् के संरक्षण पर शत-प्रतिशत आश्रित थे। लेकिन भगवान् हैं कि बड़े-से-बड़े योद्धाओं की उपेक्षा करके क्षण भर में उनका विनाश कर देते हैं। जब उन्होंने देखा कि अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को काटने के लिए पाण्डवों के पास बिल्कुल समय नहीं रह गया, तो उन्होंने अपने ही प्रण को भी तोड़ते हुए, तुरन्त अपना अस्त्र उठा लिया। यद्यपि कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त-प्राय था, तो भी अपने प्रण के अनुसार, उन्हें अपना अस्त्र नहीं उठाना चाहिए था। लेकिन इस समय तो प्रण की अपेक्षा आपात्काल अधिक महत्त्वपूर्ण था। वे भक्त-वत्सल के रूप में अधिक सुविदित हैं, अतएव वे ऐसे सांसारिक आदर्शवादी नहीं बनना चाहते, जो कभी अपना प्रण नहीं तोड़ते, अपितु उन्होंने भक्त-वत्सल बने रहना अधिक पसन्द किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥