श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.8.15 
यद्यप्यस्त्रं ब्रह्मशिरस्त्वमोघं चाप्रतिक्रियम् ।
वैष्णवं तेज आसाद्य समशाम्यद् भृगूद्वह ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यद्यपि—यद्यपि; अस्त्रम्—अस्त्र; ब्रह्म-शिर:—परम्, सर्वश्रेष्ठ; तु—लेकिन; अमोघम्—बिना रोक-टोक के; च—तथा; अप्रतिक्रियम्—जिसका निवारण न किया जा सके; वैष्णवम्—विष्णु से सम्बन्धित; तेज:—बल; आसाद्य—सामने आने पर; समशाम्यत्—शान्त पड़ गया; भृगु-उद्वह—हे भृगु-वंशकी शान ।.
 
अनुवाद
 
 हे शौनक, यद्यपि अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया परम ब्रह्मास्त्र अमोघ था और उसका निवारण नहीं हो सकता था, लेकिन विष्णु (श्रीकृष्ण) के तेज के समक्ष वह निष्क्रिय हो गया और व्यर्थ हो गया।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि दिव्य जाज्वल्यमान प्रभा ब्रह्मज्योति भगवान् श्रीकृष्ण पर आश्रित है। दूसरे शब्दों में ब्रह्म-तेज भगवान् की किरणों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, जिस प्रकार कि सूर्य-किरणें सूर्य के गोले से ही निकली किरणें हैं। अतएव यह ब्रह्मास्त्र भी, यद्यपि भौतिक रूप से अमोघ था, किन्तु भगवान् के परम तेज से पार नहीं पा सका। अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र श्रीकृष्ण द्वारा अपनी शक्ति के बल पर, निष्क्रिय एवं व्यर्थ कर दिया गया, अर्थात् उन्हें किसी की सहायता नहीं लेनी पड़ी, क्योंकि वे परम पूर्ण हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥