श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
मा मंस्था ह्येतदाश्चर्यं सर्वाश्चर्यमयेऽच्युते ।
य इदं मायया देव्या सृजत्यवति हन्त्यज: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
मा—मत; मंस्था:—सोचो; हि—निश्चय ही; एतत्—ये सब; आश्चर्यम्—आश्चर्यजनक; सर्व—समस्त; आश्चर्य-मये— परम आश्चर्ययुक्त; अच्युते—अच्युत में; य:—जो; इदम्—यह (सृष्टि); मायया—उनकी शक्ति द्वारा; देव्या—दिव्य; सृजति—उत्पन्न करता है; अवति—पालन करता है; हन्ति—संहार करता है; अज:—अजन्मा ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मणों, इसे गुह्य तथा अच्युत भगवान् के कार्य-कलापों में विशेष आश्चर्यजनक मत सोचो। वे अपनी दिव्य शक्ति से समस्त भौतिक वस्तुओं का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं यद्यपि वे स्वयं अजन्मा हैं।
 
तात्पर्य
 जीवों के नन्हें मस्तिष्क के लिए भगवान् के कार्यकलाप सदैव अकल्पनीय होते हैं। परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है, लेकिन उनके सारे कार्य हमारे लिए आश्चर्यजनक लगते हैं, और इस प्रकार वे सदा हमारी विचारशक्ति की सीमा से परे बने रहते हैं। भगवान् सर्वशक्तिमान तथा पूर्ण परमेश्वर हैं। भगवान् शत-प्रतिशत पूर्ण हैं, जबकि दूसरे अर्थात् नारायण, ब्रह्मा, शिव, देवतागण तथा अन्य सारे जीवों में ऐसी पूर्णता का कुछ प्रतिशत ही पाया जाता है। कोई भी न तो उनके तुल्य है, न उनसे बड़ा। वे अद्वितीय हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥