श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 2

 
श्लोक
ते निनीयोदकं सर्वे विलप्य च भृशं पुन: ।
आप्लुता हरिपादाब्जरज:पूतसरिज्जले ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे सब; निनीय—अर्पित करके; उदकम्—जल; सर्वे—सभी; विलप्य—विलाप करके; च—तथा; भृशम्—पर्याप्त; पुन:—फिर; आप्लुता:—स्नान किया; हरि-पादाब्ज—भगवान् के चरणकमल की; रज:—धूलि से; पूत—पवित्र; सरित्—गंगा नदी के; जले—जल में ।.
 
अनुवाद
 
 उनके लिए शोक कर चुकने तथा पर्याप्त गंगाजल अर्पित कर चुकने के बाद उन सबों ने गंगा में स्नान किया, जिसका जल भगवान् के चरणकमलों की धूलि मिल जाने के कारण पवित्र हो गया है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥