श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 20

 
श्लोक
तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रिय: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तथा—इसके अतिरिक्त; परमहंसानाम्—उन्नत अध्यात्मवादियों का; मुनीनाम्—महान चिन्तकों या विचारकों का; अमल- आत्मनाम्—आत्मा तथा पदार्थ में अन्तर करने में सक्षम; भक्ति-योग—भक्ति का विज्ञान; विधान-अर्थम्—सम्पन्न करने के लिए; कथम्—कैसे; पश्येम—देख सकती हैं; हि—निश्चित ही; स्त्रिय:—स्त्रियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 आप उन्नत अध्यात्मवादियों तथा आत्मा एवं पदार्थ में अन्तर करने में सक्षम होने से शुद्ध बने विचारकों के हृदयों में भक्ति के दिव्य विज्ञान का प्रसार करने के लिए स्वयं अवतरित होते हैं। तो फिर हम स्त्रियाँ आपको किस तरह पूर्ण रूप से जान सकती हैं?
 
तात्पर्य
 बड़े-बड़े दार्शनिक-चिन्तक तक भगवान् के धाम तक नहीं पहुँच पाते। उपनिषदों में कहा गया है कि परम सत्य, परमेश्वर का परम व्य्िक्तत्व बड़े-से-बड़े दार्शनिक की चिन्तन शक्ति से परे है। वे महान विद्या या महानतम् मस्तिष्क द्वारा भी नहीं जाने जा सकते। उन्हें वही जान पाता है, जिस पर उनकी कृपा हुइ हो। अन्य लोग भले ही वर्षों तक उनका चिन्तन करते ही क्यों न रहें, वे अज्ञेय ही रहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि महारानी कुन्ती द्वारा होती है, जो एक अबोध स्त्री की भूमिका निभा रही हैं। स्त्रियाँ सामान्य रूप से दार्शनिकों की भाँति चिन्तन नहीं कर सकतीं, लेकिन उन्हें भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त
है, क्योंकि वे भगवान् की श्रेष्ठता तथा सर्वशक्तिमत्ता पर तुरन्त विश्वास कर लेती हैं और बिना किसी संकोच के नतमस्तक हो जाती हैं। भगवान् इतने दयालु हैं कि वे केवल ऐसे व्यक्ति पर विशेष अनुग्रह नहीं करते, जो महान दार्शनिक होता है। वे प्रयोजन की निष्ठा को जानते हैं। इसीलिए प्राय: किसी भी धार्मिक उत्सव के अवसर पर स्त्रियाँ बड़ी संख्या में एकत्र होती हैं। प्रत्येक देश में तथा प्रत्येक धर्म के सम्प्रदाय में ऐसा लगता है कि स्त्रियों की रुचि पुरुषों से अधिक है। भगवान् की सत्ता की स्वीकृति की यह सरलता निष्ठारहित धार्मिक दिखावे से कहीं अधिक प्रभावोत्पादक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥