श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
नम: पङ्कजनाभाय नम: पङ्कजमालिने ।
नम: पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्‍घ्रये ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार है; पङ्कज-नाभाय—भगवान् को, जिनके उदर के मध्यभाग में कमल-पुष्प के समान विशेष गड्ढा है; नम:—नमस्कार; पङ्कज-मालिने—कमल-पुष्प की माला से निरन्तर सज्जित रहनेवाले को; नम:—नमस्कार; पङ्कज नेत्राय—जिनकी दृष्टि कमल-पुष्प के समान शीतल है; नम: ते—आपको नमस्कार है; पङ्कज-अङ्घ्रये—कमल-पुष्पों से अंकित चरण के तलवों वाले को ।.
 
अनुवाद
 
 जिनके उदर के मध्य में कमलपुष्प के सदृश गर्त है, जो सदैव कमल-पुष्प की माला धारण करते हैं, जिनकी चितवन कमल-पुष्प के समान शीतल है और जिनके चरणों (के तलवों) में कमल अंकित हैं, उन भगवान् को मैं सादर नमस्कार करती हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् के दिव्य शरीर में कुछ विशिष्ट चिह्न होते हैं, जिनसे उनका शरीर अन्य सारे व्यक्तियों के शरीर से भिन्न लगता है। ये भगवान् के शरीर के विशिष्ट चिह्न हैं। भले ही भगवान् हम में से एक जैसे लगते हों, लेकिन वे अपने विशिष्ट शारीरिक लक्षणों के कारण सर्वदा भिन्न रहते हैं। श्रीमती कुन्ती अपने आपको भगवान् का दर्शन कर पाने में अक्षम मानती हैं, क्योंकि वे स्त्री हैं। ऐसा माना जाता है कि स्त्रियाँ, शूद्र (श्रमिक वर्ग) तथा द्विज-बन्धु (तीनों द्विज-जातियों की नीच सन्तानें) परम सत्य के नाम, यश, लक्षण, रूप आदि से सम्बन्धित दिव्य विषय को समझने में असमर्थ होते हैं। यद्यपि ऐसे व्यक्ति भगवान् की लीलाओं को समझने में असमर्थ होते हैं, तो भी वे भगवान् को अर्चा-विग्रह के रूप में देख सकते हैं, जो उपर्युक्त स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज-बन्धुओं समेत समस्त पतितात्माओं पर दया करने के उद्देश्य से भौतिक जगत में अवतरित होते हैं। चूँकि ऐसे पतित लोग पदार्थ के परे कुछ भी नहीं देख पाते, अत: भगवान् गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में असंख्य ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक में प्रविष्ट होने के लिए सन्नद्ध होते हैं, जिनके दिव्य उदर के मध्य के कमलवत् गड्ढे (नाभि) से कमल-नाल अंकुरित होती है और इस तरह, ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा का जन्म होता है। इसीलिए भगवान् को पंकज-नाभि कहा जाता है। ये पंकज-नाभि भगवान् अनेक तत्त्वों के बने अर्चा-विग्रह के रूप को स्वीकार करते हैं—यथा मन के भीतर बना रूप, मिट्टी का रूप, पार्थिव रूप, धातु रूप, रत्न-रूप, रंग-रूप, बालपर अंकित किया गया रूप इत्यादि। भगवान् के इन सारे रूपों को कमल की मालाओं से सजाया जाता है। पूजा-मन्दिर में ऐसा शान्तिप्रद वातावरण होना चाहिए, जिससे भौतिक कार्यों में सदैव निरत रहनेवाले अभक्तजनों का उत्कट ध्यान उस ओर आकृष्ट हो। ध्यानी लोग मन के भीतर एक साकार रूप की पूजा करते हैं, अतएव भगवान् स्त्रियों, शूद्रों तथा द्विज-बन्धुओं पर भी दयालु होते हैं, बशर्ते कि वे विविध रूपों में बने पूजा-मन्दिरों में जाना स्वीकार करें। ऐसे मन्दिर जानेवाले मूर्ति-पूजक नहीं होते, जैसाकि कुछ अल्पज्ञ लोगों द्वारा कहा जाता है। बड़े-बड़े आचार्यों ने अल्पज्ञानियों पर कृपा करते हुए सर्वत्र ऐसे पूजा-मन्दिरों की स्थापना की। वास्तव में शुद्रों या स्त्रियों अथवा उनसे भी निम्न श्रेणी में रहते हुए किसी को यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि उसने मंदिर-पूजा की अवस्था पार कर ली है। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् का दर्शन करने में उनके चरणकमलों से प्रारम्भ करके क्रमश: जाँघों, कमर, वक्षस्थल तथा मुख तक पहुँचे। उसे भगवान् के चरणकमलों के दर्शन का अभ्यास किये बिना भगवान् के मुख का दर्शन करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। भगवान् की बुआ होने के कारण श्रीमती कुन्ती ने भगवान् का दर्शन चरणकमलों से प्रारम्भ नहीं किया, क्योंकि इससे भगवान् लज्जित होते। अतएव इस स्थिति से बचने के लिए उन्होंने भगवान् के चरणकमलों के ऊपर के भाग अर्थात् कमर से धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठते हुए मुख का, और फिर चरणकमलों का दर्शन किया। चक्र में प्रत्येक वस्तु समुचित क्रम से हो जाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥