श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
यथा हृषीकेश खलेन देवकी
कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता ।
विमोचिताहं च सहात्मजा विभो
त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—मानो; हृषीकेश—इन्द्रियों के स्वामी; खलेन—ईष्यालु के द्वारा; देवकी—देवकी (श्रीकृष्ण की माता); कंसेन— राजा कंस द्वारा; रुद्धा—बन्दी बनाया गया; अति-चिरम्—दीर्घ काल तक; शुच-अर्पिता—दुखी; विमोचिता—मुक्त किया; अहम् च—मैं भी; सह-आत्म-जा—अपने बच्चों सहित; विभो—हे महान्; त्वया एव—आप ही के द्वारा; नाथेन—रक्षक के रूप में; मुहु:—निरन्तर; विपत्-गणात्—विपत्तियों के समूह से ।.
 
अनुवाद
 
 हे हृषीकेश, हे इन्द्रियों के स्वामी तथा देवों के देव, आपने दीर्घ काल तक बन्दीगृह में बन्दिनी बनाई गई और दुष्ट राजा कंस द्वारा सताई जा रही अपनी माता देवकी को तथा अनवरत विपत्तियों से घिरे हुए मेरे पुत्रों समेत मुझको मुक्त किया है।
 
तात्पर्य
 कृष्ण की माता तथा कंस की बहन देवकी को उसके पति वसुदेव सहित बन्दीगृह में रख दिया गया था, क्योंकि दुष्ट राजा कंस को भय था कि वह देवकी के आठवें पुत्र (कृष्ण) द्वारा मारा जायेगा। उसने कृष्ण के पूर्व पैदा हुए देवकी के सारे बच्चों का वध कर दिया था, किन्तु कृष्ण बाल-वध के संकट से बच निकले, क्योंकि वे भगवान् कृष्ण के पालकपिता नन्द महाराज के घर पहुँचा दिये गये थे। कुन्ती देवी भी अपने पुत्रों समेत, अनेक कष्टों की शृंखला से बचाई जाती रहीं। लेकिन भगवान् कृष्ण ने कुन्ती देवी पर कुछ अधिक ही अनुग्रह किया था, क्योंकि उन्होंने देवकी के अन्य पुत्रों की रक्षा नहीं की, जबकि कुन्ती के पुत्रों की रक्षा की। इसका कारण यह था कि देवकी के पति वसुदेव जीवित थे, लेकिन कुन्ती विधवा थीं और कृष्ण के अतिरिक्त उनका अन्य कोई रक्षक न था। निष्कर्ष यह है कि कृष्ण उस भक्त पर अधिक अनुग्रह करते हैं, जो अधिक संकट में होता है। कभी-कभी वे जानकर शुद्ध भक्तों को ऐसे संकटों में डालते हैं, क्योंकि ऐसी असहायावस्था में भक्त भगवान् के प्रति अधिक अनुरक्त बनता है। भगवान् के प्रति जितनी अधिक अनुरक्ति होगी, भक्त को उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त होगी।
 
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